अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए धार्मिक शिक्षा का ड्राफ्ट तैयार, सुझाव लेने को समुदाय और धर्मगुरुओं संग हुई बैठक

राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने कक्षा एक से आठवीं तक के विद्यार्थियों के लिए धार्मिक शिक्षा का प्रारूप तैयार किया है. अंतिम रूप देने से पहले समुदाय के प्रतिनिधियों और धर्मगुरुओं से सुझाव लिए गए, ताकि पाठ्यक्रम को अधिक समावेशी और उपयोगी बनाया जा सके.

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Shanu Sharma

राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा को व्यवस्थित ढंग से लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है. प्राधिकरण ने कक्षा एक से आठवीं तक के विद्यार्थियों के लिए धार्मिक शिक्षा का प्रारूप (ड्राफ्ट) तैयार किया है. हालांकि इसे अंतिम रूप देने से पहले विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और धर्मगुरुओं से सुझाव लेने की प्रक्रिया शुरू की गई है.

इसी क्रम में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के सभागार में एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें पाठ्यक्रम के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई. बैठक का उद्देश्य ऐसा पाठ्यक्रम तैयार करना था, जो विद्यार्थियों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ समुदाय की अपेक्षाओं पर भी खरा उतर सके.

कक्षा एक से आठवीं तक होगा पाठ्यक्रम लागू

बैठक को संबोधित करते हुए राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी ने बताया कि धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम कक्षा एक से आठवीं तक के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि अंतिम रूप देने से पहले समुदाय के लोगों और धर्मगुरुओं की राय को शामिल करना आवश्यक है, ताकि पाठ्यक्रम अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बन सके. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा के इस प्रारूप का उद्देश्य विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक समझ और धार्मिक परंपराओं के प्रति जागरूकता विकसित करना है.


एनईपी 2020 के अनुरूप तैयार किया गया प्रारूप

प्राधिकरण द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट को नई शिक्षा नीति (एनईपी 2020) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप तीन चरणों में विभाजित किया गया है. इसमें आधारभूत स्तर के अंतर्गत कक्षा एक और दो, प्रारंभिक स्तर में कक्षा तीन से पांच तथा मध्य स्तर में कक्षा छह से आठ तक के विद्यार्थियों को शामिल किया गया है. इस संरचना का उद्देश्य विद्यार्थियों की आयु और समझ के स्तर के अनुसार विषयवस्तु को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करना है, जिससे सीखने की प्रक्रिया अधिक सहज और प्रभावी बन सके.

प्रस्तावित पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों की पारंपरिक लिखित परीक्षा नहीं होगी. उनकी प्रगति का मूल्यांकन मौखिक प्रश्नों, विभिन्न प्रतियोगिताओं और चित्र प्रस्तुति जैसी गतिविधियों के माध्यम से किया जाएगा. शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की मूल्यांकन प्रणाली से विद्यार्थियों में रचनात्मकता, आत्मविश्वास और विषय की व्यावहारिक समझ विकसित होगी. साथ ही उन पर परीक्षा का अनावश्यक दबाव भी नहीं पड़ेगा.