चमोली: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चमोली जिले के गोपेश्वर स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन किया और इसके बाद सोशल मीडिया पर मंदिर की महिमा का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन मंदिर हिमालय की सुंदर वादियों के बीच स्थित आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रमुख केंद्र है.
मुख्यमंत्री ने लोगों से अपील की कि चमोली आने पर इस पवित्र मंदिर के दर्शन अवश्य करें. उन्होंने कहा कि मंदिर का शांत वातावरण और दिव्य आभा श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराती है.
गोपेश्वर, चमोली में स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर भगवान शिव की अनंत महिमा और आस्था का अद्भुत केंद्र है। हिमालय की सुरम्य वादियों और मनोहारी प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति एवं दिव्य अनुभूति प्रदान करता है।
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) June 22, 2026
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गोपीनाथ मंदिर उत्तराखंड के सबसे विशाल और ऊंचे प्राचीन शिव मंदिरों में गिना जाता है. इसका निर्माण आठवीं सदी का माना जाता है, जबकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर आदि काल से भगवान शिव को समर्पित है. मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, विशाल शिखर और लगभग 30 फुट ऊंचे गर्भगृह के लिए प्रसिद्ध है. इतिहासकारों के अनुसार इसका निर्माण नौवीं से ग्यारहवीं सदी के बीच संभवतः कत्यूरी शासकों द्वारा कराया गया था.
मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार जब भगवान कृष्ण यहां रासलीला कर रहे थे, तब भगवान शिव गोपी का रूप धारण कर उसमें शामिल हो गए. भगवान कृष्ण ने उन्हें पहचान लिया और कहा कि आप तो गोपियों के नाथ हैं. तभी से इस स्थान का नाम गोपीनाथ पड़ गया.
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर पंच केदारों में शामिल रुद्रनाथ मंदिर का गद्दी स्थल भी माना जाता है. मंदिर परिसर में भगवान गणेश, हनुमान, नवदुर्गा और अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी स्थित हैं. यहां नटराज की दिव्य प्रतिमा, आकाश भैरव का प्राचीन त्रिशूल और कई ऐतिहासिक मूर्तियां श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं.
वर्ष 1802 में आए भूकंप से मंदिर परिसर को नुकसान पहुंचा था और कई प्राचीन मूर्तियां क्षतिग्रस्त हो गई थीं. इसके बावजूद मंदिर आज भी अपनी भव्यता और धार्मिक महत्व को बनाए हुए है.
गोपीनाथ मंदिर की एक और विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव की पूजा विष्णु स्वरूप में भी की जाती है. इसी कारण मंदिर में विष्णु सहस्रनाम पाठ के साथ रुद्राभिषेक की परंपरा भी निभाई जाती है. यही विशेषता इस मंदिर को अन्य शिव मंदिरों से अलग पहचान देती है.