350 साल से अटूट है आस्था, अल्मोड़ा में आज भी विराजमान हैं मां नंदा देवी; जानें इस चमत्कारी धाम का इतिहास
अल्मोड़ा का नंदा देवी मंदिर उत्तराखंड की आस्था और संस्कृति का प्रमुख केंद्र है. यहां करीब 350 वर्षों से मां नंदा देवी की पूजा की जा रही है. चलिए जानते हैं क्या है इसका इतिहास.
कुमाऊं: उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जुड़ी मां नंदा देवी की पूजा सदियों से की जाती रही है. विशेष रूप से कुमाऊं क्षेत्र में मां नंदा देवी को अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजनीय माना जाता है. अल्मोड़ा में स्थित प्राचीन नंदा देवी मंदिर इस आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां करीब 350 वर्षों से मां की पूजा-अर्चना निरंतर की जा रही है. मां नंदा देवी को उत्तराखंड की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है और उनका महत्व पूरे राज्य में विशेष रूप से देखा जाता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां नंदा देवी को देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का रूप माना जाता है. देवी भागवत में भी नंदा को नौ देवियों में से एक बताया गया है. इसी कारण उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में मां नंदा की विशेष पूजा की परंपरा प्रचलित है. हर वर्ष आयोजित होने वाले नंदा देवी महोत्सव में हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं और देवी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं.
क्या है इस मंदिर का इतिहास?
अल्मोड़ा में मां नंदा देवी के मंदिर का इतिहास लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पुराना है. ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वर्ष 1670 में कुमाऊं के चंद वंशीय शासक बाज बहादुर चंद बधाणगढ़ के किले से मां नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा अल्मोड़ा लेकर आए थे. उन्होंने इस प्रतिमा को मल्ला महल, जो वर्तमान में कलक्ट्रेट परिसर के रूप में जाना जाता है, में स्थापित किया और मां को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजना शुरू किया.
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चंद शासकों के शासनकाल में मां नंदा देवी की पूजा को व्यापक पहचान मिली. इससे पहले भी कत्यूरी, चंद और गढ़वाल राजवंशों के शासक मां नंदा देवी को अपनी कुलदेवी मानकर उनकी आराधना करते थे. यही कारण है कि आज भी उत्तराखंड के अनेक हिस्सों में मां नंदा देवी की विशेष मान्यता है.
क्या है पूरी कहानी?
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि वर्ष 1699 में राजा ज्ञान चंद भी बधानकोट से मां नंदा देवी की एक स्वर्ण प्रतिमा अल्मोड़ा लेकर आए थे. इसके बाद वर्ष 1710 में राजा जगत चंद को बधानकोट विजय के दौरान देवी की प्रतिमा नहीं मिल सकी. तब उन्होंने अपने खजाने की 200 अशर्फियों को गलवाकर मां नंदा देवी की नई प्रतिमा तैयार करवाई. इस प्रतिमा को भी मल्ला महल स्थित नंदा देवी मंदिर में स्थापित किया गया.
आज यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है. यहां आने वाले श्रद्धालु मां नंदा देवी के दर्शन कर सुख, समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं. सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ रही है.