53 साल और 3,600+ बाघ…अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर जानें प्रोजेक्ट टाइगर की शानदार सफलता
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व इस सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है. 1,288 वर्ग किलोमीटर में फैले इस रिजर्व में 2006 में करीब 150 बाघ थे, जो 2010 में 184 और 2014 में 215 हो गए. 2022 में यहां 260 से ज्यादा बाघ गिने गए. आसपास के इलाकों को मिलाकर यह संख्या 300 के पार पहुंच गई है.
International Tiger Day 2026: 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जा रहा है. इस मौके पर देश में बाघ संरक्षण की बड़ी सफलता सामने आ रही है. प्रोजेक्ट टाइगर की शुरूआत के 53 साल बाद भारत में बाघों की संख्या 3,600 से ज्यादा हो गई है. खासकर उत्तराखंड के प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में 260 से अधिक बाघ हैं, जो पूरे देश में सबसे ज्यादा घनत्व वाला क्षेत्र है.
प्रोजेक्ट टाइगर की कहानी
साल 1973 में जब प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ था, तब पूरे भारत में सिर्फ 1,411 बाघ बचे थे. लगातार प्रयासों के बाद स्थिति बदली. साल 2010 में बाघों की संख्या 1,706, 2014 में 2,226, 2018 में 2,967 और 2022 की गणना में बढ़कर 3,682 पहुंच गई. आज देश में 58 टाइगर रिजर्व हैं.
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व इस सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है. 1,288 वर्ग किलोमीटर में फैले इस रिजर्व में 2006 में करीब 150 बाघ थे, जो 2010 में 184 और 2014 में 215 हो गए. 2022 में यहां 260 से ज्यादा बाघ गिने गए. आसपास के इलाकों को मिलाकर यह संख्या 300 के पार पहुंच गई है. कॉर्बेट का घना जंगल, नदियां और समृद्ध जंगली जीवन बाघों के लिए आदर्श जगह बना हुआ है.
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सफलता के फायदे
बाघों की संख्या बढ़ने से स्थानीय लोगों को बड़ा फायदा हुआ है. पर्यटन बढ़ा है, जिससे होटल, गाइड, सफारी और स्थानीय बाजार में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं. बाघों की वजह से जंगलों की सुरक्षा भी मजबूत हुई है और जैव विविधता बनी रही है.
अब सामने आ रही चुनौतियां
सफलता के साथ नई समस्याएं भी पैदा हो रही हैं. कॉर्बेट जैसे क्षेत्रों में बाघों की संख्या ज्यादा होने से सीमित जंगल की समस्या बढ़ गई है. बाघों को रहने के लिए ज्यादा जगह चाहिए, लेकिन जंगल सीमित हैं.
मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बड़ी चुनौती बन गया है. बाघों के इलाके में गांवों की बढ़ती आबादी और खेती के कारण कभी-कभी बाघ गांवों में घुस जाते हैं, जिससे दोनों तरफ नुकसान होता है. इसके अलावा कचरा प्रबंधन की समस्या भी गंभीर है. बढ़ते पर्यटकों के कारण जंगलों में प्लास्टिक और कचरा फैल रहा है, जो वन्यजीवों के स्वास्थ्य के लिए खतरा है.