SDRF, NDRF से लेकर पुलिस सब थे मौजूद...फिर भी नहीं बच पाई नोएडा के टेक एक्सपर्ट युवराज मेहता की जान, कौन है जिम्मेदार?
इंजीनियर युवराज मेहता का मामला इस समय पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. इस घटना ने ना केवल सिस्टम की कमी को उजागर किया है बल्कि देश की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
लखनऊ: सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता के साथ घटी घटना ने पूरे देश का ध्यान आपातकालीन बचाव व्यवस्था की ओर लाया है. इस घटना में घंटों तक युवराज पानी से भरी एक गहरी खाई में फंसे रहें लेकिन सिस्टम उन्हें बचा नहीं पाई.
इसी के साथ सिस्टम की तैयारियों, प्रशिक्षण और समन्वय की भारी कमी देश के लोगों के सामने आई है. इतना ही नहीं वहां मौजूद दर्जनों बचावकर्मियों और कई एजेंसियों के बावजूद एक युवा की जान नहीं बच पाई.
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला 16 जनवरी की रात का है. जब युवराज मेहता की कार नोएडा में एक निर्माणाधीन मॉल के पास पानी से भरी खाई में फंस गई. युवराज तैरना नहीं जानता था, फिर भी वह करीब डेढ़ घंटे तक कार को पकड़े मदद के लिए चिल्लाता रहा. उसने अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर इशारा भी किया, लेकिन घना कोहरा और अंधेरा उसकी आवाज और रोशनी दोनों को निगल गया. आखिरकार, करीब 1:30 बजे उसकी आवाजें बंद हो गईं.
युवराज के पिता राज मेहता को सबसे पहले SOS कॉल मिला. उन्होंने तुरंत 112 पर कॉल किया. महज 9 मिनट में पुलिस की पेट्रोल टीम मौके पर पहुंच गई. इसके बाद स्थानीय पुलिस, फायर ब्रिगेड, SDRF और अंत में NDRF भी घटनास्थल पर पहुंची. कुल मिलाकर करीब 80 लोग वहां मौजूद थे, लेकिन कोई भी समय रहते पानी में उतरकर युवराज तक नहीं पहुंच सका. एक डिलीवरी बॉय ने जरूर हिम्मत दिखाई और ठंडे पानी में कूदने की कोशिश की, लेकिन वह भी असफल रहा.
पूरे सिस्टम पर उठ रहे सवाल
यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह और ओपी सिंह ने इस घटना को साफ तौर पर संस्थागत विफलता बताया है. उनका कहना है कि मौके पर पहुंचे पहले रिस्पॉन्डर्स प्रशिक्षित थे, फिर भी उनमें इच्छाशक्ति और नेतृत्व की कमी दिखी. पुलिस ट्रेनिंग में तैराकी शामिल होने के बावजूद किसी अधिकारी का पानी में न उतरना गंभीर सवाल खड़े करता है.
डायल 112 की पुलिस गाड़ियों में रस्सी, टॉर्च और फर्स्ट एड जैसी सुविधाएं तो होती हैं, लेकिन लाइफ जैकेट, ऑक्सीजन सिलेंडर या फोल्डेबल नाव जैसे जरूरी उपकरण शामिल नहीं हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी इलाकों में, जहां खुले नाले और गहरी खाइयां आम खतरा बन चुकी हैं, फर्स्ट रिस्पॉन्डर्स के पास वाटर रेस्क्यू उपकरण होना अनिवार्य है. हादसे के दौरान पुलिस, फायर ब्रिगेड, SDRF और NDRF सभी अपनी-अपनी भूमिका में काम करते दिखे, लेकिन कोई एक कमांड सेंटर या नेतृत्व नहीं था. फायर ब्रिगेड के पास गहरे पानी में उतरने का उपकरण नहीं था, SDRF को नाव उतारने में ही दो घंटे लग गए और NDRF देर से पहुंची.
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