उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की अदालत में लंबित करीब 100 हत्या के मामलों को प्रशासनिक आदेश के जरिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया है. अधिकारियों के अनुसार, यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब दिवाकर की अदालत ने पिछले चार महीनों में 10 मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई.
सरकारी अधिवक्ता कुलदीप कुमार ने बताया कि जिन मामलों में मौत की सजा या उम्रकैद का प्रावधान है, उन्हें दिवाकर की अध्यक्षता वाली फास्ट-ट्रैक अदालत से जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में भेजा गया है. जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने बताया कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि, वकीलों और मुकदमों से जुड़े पक्षकारों के बीच मृत्युदंड दिए जाने की आशंका को लेकर चिंता थी.
रवि कुमार दिवाकर की अदालत में मृत्युदंड सुनाए जाने का सिलसिला पिछले कुछ महीनों में लगातार देखने को मिला. 6 अप्रैल को वकील समीर सैफी हत्याकांड में तीन दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई. इसके बाद 28 अप्रैल को चार, 20 जून को दो, 2 जुलाई को एक, 6 जुलाई को दो और 17 जुलाई को चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया. अगस्त में भी पांच दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई.
इन फैसलों की रफ्तार इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के Square Circle Clinic की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे उत्तर प्रदेश में निचली अदालतों ने पूरे साल 20 मामलों में 28 मृत्युदंड सुनाए थे. ऐसे में एक ही अदालत द्वारा कुछ महीनों में 22 मौत की सजाएं सुनाया जाना न्यायिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया है.
सत्र अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा तुरंत लागू नहीं होती. भारतीय कानून के तहत ऐसे हर फैसले की हाई कोर्ट से पुष्टि जरूरी होती है. इस बीच दोषी को कानूनी उपायों का अधिकार रहता है. दिवाकर की अदालत के फैसलों ने मृत्युदंड और ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत को लेकर भी बहस तेज की है. इस सिद्धांत के तहत मौत की सजा केवल बेहद असाधारण मामलों में दिए जाने की व्यवस्था है.
जुलाई 1980 में जन्मे रवि कुमार दिवाकर ने 2009 में सिविल जज के रूप में न्यायिक सेवा शुरू की. वह सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी और बरेली समेत कई जिलों में तैनात रहे हैं और नवंबर 2025 से मुजफ्फरनगर में कार्यरत हैं. 2022 में वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफिक सर्वे का आदेश देने के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे. 2024 में बरेली दंगों से जुड़े आदेश में उनकी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को प्लेटो के ‘दार्शनिक राजा’ से जोड़ने वाली टिप्पणी भी चर्चा में रही, जिसे बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड से हटा दिया.