काशी की गुलाबी मीनाकारी राखियों का दुनिया में बजा डंका, CM का साथ और PM मोदी बने सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर
रक्षाबंधन के पावन पर्व पर काशी की सदियों पुरानी और विश्वप्रसिद्ध ‘गुलाबी मीनाकारी’ का जादू एक बार फिर सात समंदर पार सिर चढ़कर बोल रहा है.
बनारस: रक्षाबंधन के पावन पर्व पर काशी की सदियों पुरानी और विश्वप्रसिद्ध ‘गुलाबी मीनाकारी’ का जादू एक बार फिर सात समंदर पार सिर चढ़कर बोल रहा है. बनारस की तंग गलियों में तैयार होने वाली नक्काशीदार राखियों की मांग इस बार वैश्विक स्तर पर देखने को मिल रही है. खासकर कैलिफोर्निया, फ्लोरिडा, स्पेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में बसे भारतीय समुदाय के बीच इन पारंपरिक व कलात्मक राखियों का जबर्दस्त क्रेज है.
400 साल पुराना इतिहास और जीआई टैग की ताकत:
काशी की गुलाबी मीनाकारी का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना है. 17वीं सदी में फारस से बनारस आई इस विधा को स्थानीय कारीगरों ने सफेद इनेमल पर प्राकृतिक गुलाबी रंगों की नक्काशी देकर एक अलग मुकाम दिया. इसे पहले ही भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग प्रदान कर दिया गया था. जीआई टैग मिलने के बाद से ही इस कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असली कानूनी पहचान और सुरक्षा मिली, जिसने इसके वैश्विक बाजार का रास्ता खोला.
सीएम की ODOP योजना और करोड़ों का कारोबार:
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा इसे 'एक जिला एक उत्पाद' में शामिल किए जाने के बाद इस पारंपरिक उद्योग को नई ताकत मिली. गुलाबी मीनाकारी के नेशनल अवार्डी मास्टर आर्टिजन कुंज बिहारी सिंह के अनुसार, इस बार सीजन में कई देशों से भारी डिमांड आई है और इसका कारोबार करोड़ों रुपये का आंकड़ा छू रहा है. कारीगर पिछले एक महीने से कैलिफोर्निया और स्पेन जैसे देशों के ऑर्डर्स को पूरा करने के लिए दिन-रात चांदी व सोने की नक्काशीदार राखियां तैयार करने में जुटे हैं.
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पीएम मोदी खुद बने सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर:
इस कला को दुनिया के कोने-कोने में पहुंचाने का सबसे बड़ा श्रेय देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है. अक्सर प्रधानमंत्री जब भी विदेश यात्रा पर जाते हैं या भारत में विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और वैश्विक नेताओं की मेजबानी करते हैं, तो ज्यादातर उन्हें उपहार स्वरूप काशी की नायाब गुलाबी मीनाकारी भेंट करते हैं. इस कूटनीतिक पहल ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस कला की सबसे मजबूत ब्रांडिंग की है, जिससे विदेशों में इसकी मांग में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
आज काशी की यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर न केवल स्थानीय कारीगरों को आत्मनिर्भर बना रही है, बल्कि दुनिया भर में भारतीय कला, संस्कृति और रिश्तों के पवित्र बंधन का प्रतीक बनकर चमक रही है.