काकोरी ट्रेन एक्शन-डे: शहीद रोशन सिंह की जन्मभूमि को मिला सम्मान, CM योगी के फैसले ने बदली तस्वीर
ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि दशकों तक विकास की बाट जोहती रही. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हस्तक्षेप से खन्नौत नदी पर पक्का पुल बना और गांव को बरसात में कटने की समस्या से राहत मिली.
शाहजहांपुर के नवादा गांव का नाम अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की वजह से स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में खास स्थान रखता है. जिस मिट्टी ने देश को ऐसा वीर क्रांतिकारी दिया, वहां के ग्रामीणों को लंबे समय तक बारिश में संपर्क टूटने की परेशानी झेलनी पड़ी.
नदी का जलस्तर बढ़ते ही गांव तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था. कई पीढ़ियां इस समस्या के बीच जीवन बिताती रहीं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संज्ञान के बाद इस स्थिति में बदलाव आया और गांव को बड़ी राहत मिली.
शहादत की धरती को मिला सम्मान
ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में खन्नौत नदी पर बने पक्के पुल की अहम भूमिका रही. पहले ग्रामीण पीपे के सहारे नदी पार करते थे. बारिश में यह व्यवस्था बेहद मुश्किल हो जाती थी. पुल बनने के बाद हर मौसम में आवागमन आसान हुआ. ग्रामीणों के लिए यह सुविधा केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि उस धरती के प्रति सम्मान का प्रतीक भी बनी, जिसने देश को एक महान क्रांतिकारी दिया.
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साहस से भरा था रोशन सिंह का जीवन
ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था. युवावस्था में वह कुश्ती और निशानेबाजी में माहिर थे. उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया. बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए.
अंग्रेज अफसर की बंदूक छीन ली
1922 में बरेली में चौरी-चौरा घटना के विरोध में प्रदर्शन के दौरान अंग्रेज पुलिस ने लाठीचार्ज किया. रोशन सिंह भीड़ के बीच आगे बढ़े और एक अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीन ली. उन्होंने हवा में गोली चलाकर लाठीचार्ज रुकवाया. इसके बाद उन्हें दो साल की कठोर कैद मिली. जेल से बाहर आने के बाद उनका क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ाव और मजबूत हो गया.
काकोरी कांड से जुड़ा नाम
दिसंबर 1924 में बमरौली में एचआरए की धन जुटाने वाली कार्रवाई के दौरान गोलीबारी हुई, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई. रोशन सिंह पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ. 1925 के काकोरी कांड के बाद उन्हें भी गिरफ्तार कर मुकदमे में शामिल किया गया. ट्रेन कार्रवाई में प्रत्यक्ष मौजूद नहीं होने के बावजूद संगठन से जुड़े होने के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया गया.
फांसी के फंदे तक अडिग रहा हौसला
राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथ ठाकुर रोशन सिंह को भी फांसी की सजा सुनाई गई. उन्होंने अदालत में बिस्मिल जैसी सजा देने की मांग की थी. 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में गीता का पाठ करने के बाद उन्होंने वंदे मातरम् का उद्घोष किया और हंसते हुए फांसी स्वीकार की. उनकी शहादत आज भी साहस और देशभक्ति की मिसाल है.