'हमें बस सही मजदूरी चाहिए, पुलिस हमें क्यों पीट रही है?', नोएडा में प्रदर्शनकारी महिला श्रमिकों का छलका दर्द

नोएडा में कम वेतन को लेकर तीन दिन से चल रहा मजदूरों का आंदोलन सोमवार को हिंसक हो गया. पुलिस कार्रवाई में कथित तौर पर महिलाओं के साथ मारपीट के बाद प्रदर्शनकारी भड़क उठे, जिसमें कई वाहनों में आग लगा दी गई.

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Kanhaiya Kumar Jha

नोएडा: यूपी के नोएडा में न्यूनतम वेतन वृद्धि की मांग को लेकर जारी मजदूरों का आंदोलन हिंसक हमले में बदल गया है. महिला कर्मियों के साथ कथित मारपीट के बाद भड़के आक्रोश ने आगजनी और पथराव का रूप ले लिया, जिससे पूरे इलाके में प्रशासनिक नियम और व्यवस्था ध्वस्त नजर आई.

दिल्ली-NCR के प्रमुख औद्योगिक केंद्र नोएडा के फेज-2 इलाके में पिछले तीन दिनों से सुलग रही चिंगारी सोमवार को भीषण ज्वाला बन गई. कम वेतन से त्रस्त मजदूर बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए और देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया. प्रदर्शनकारियों ने सेक्टर-1, सेक्टर-60 और सेक्टर-84 जैसे व्यस्त मार्गों को पूरी तरह जाम कर दिया. हालात तब बिगड़े जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जिसके बाद गुस्साए मजदूरों ने कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया और भारी पथराव शुरू कर दिया. इस हंगामे के कारण पूरे क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल व्याप्त रहा.

आंदोलन की मुख्य वजह कमरतोड़ महंगाई और बेहद कम मानदेय है. प्रदर्शन में शामिल महिला मजदूरों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि शांतिपूर्ण धरने के दौरान उनके साथ मारपीट की गई. 'मदरसन' कंपनी में काम करने वाली एक महिला मजदूर ने रोते हुए कहा, 'महंगाई के इस दौर में गैस सिलेंडर और सब्जियां खरीदना दूभर है. जब हमने हक मांगा, तो पुलिस ने हमारे पैरों पर लाठियां मारीं.' मजदूरों की साफ मांग है कि उनकी मासिक सैलरी 13,000 रुपये से बढ़ाकर कम से कम 20,000 रुपये की जाए, तभी वे इस शहर में जीवित रह पाएंगे.

12 घंटे की हाड़तोड़ मेहनत और मात्र 13 हजार की कमाई!

प्रदर्शन में शामिल मंजू देवी जैसी हजारों महिलाओं की कहानी रोंगटे खड़े करने वाली है. 12-12 घंटे फैक्ट्रियों में पसीना बहाने के बाद भी उन्हें मात्र 13,000 रुपये हाथ आते हैं. मजदूरों का कहना है कि कंपनियां सालाना महज 200-300 रुपये का इंक्रीमेंट देती हैं, जबकि मकान मालिक हर साल किराए में 500 रुपये तक का इजाफा कर देते हैं. ऐसे में 4 बच्चों की परवरिश और घर का खर्च चलाना एक असंभव चुनौती बन गया है. मजदूरों ने सरकार से सवाल किया कि आखिर वेतन वृद्धि का वादा अब तक कागजों से बाहर क्यों नहीं आया?