इंसान और जानवरों के बीच प्यार किस कदर परवान चढ़ सकता, उत्तर प्रदेश के आगरा से इसकी जीती जागती मिसाल सामने आई है. यहां एक परिवार ने अपने पालतू कुत्ते के निधन पर ठीक उसी तरह तेरहवीं कराईं जैसे किसी इंसान की कराई जाती हैं. यही नहीं कुत्ते की आत्मा की शांति के लिए परिवार ने हवन-पूजन कराया और 13 ब्राह्मणों को विभिवित ब्रह्म भोज कराकर दान-दक्षिणा भी दी. यह पूरी घटना इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है.
28 जनवरी को बीमारी के चलते 'तिलकधारी टाइगर' नामक कुत्ते की मौत हो गई थी. इसके बाद परिवार ने पूरे विधि विधान के साथ बुलंदशहर के राजघाट पर पूरे धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ कुत्ते का अंतिम संस्कार कराया और 13 दिन बाद उसकी तेरहवीं की रस्म निभाई गई.
तिलकधारी टाइगर के निधन पर पूरा परिवार शोकमग्न है. परिजनों का कहना है कि टाइगर सिर्फ पालतू जानवर नहीं था बल्कि पिछले 14 सालों से वह घर में बेटे की तरह रहता था.
जहाँ एक ओर शहरों में आवारा कुत्तों को लेकर विवाद और आक्रोश की खबरें सामने आ रही हैं।
— Shivani Sahu (@askshivanisahu) February 9, 2026
वहीं आगरा के शाहदरा क्षेत्र से पशु प्रेम और संवेदनशीलता की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने हर किसी का दिल छू लिया।
शाहदरा बगीची के पास रहने वाले घनश्याम दीक्षित के परिवार ने अपने पालतू डॉग… pic.twitter.com/rsRVxOtZPf
आगरा के शाहदार बगीची क्षेत्र में रहने वाले घनश्याम दीक्षीत ने बताया कि वह करीब 14 साल पहले लेब्राडोर डॉग को दिल्ली से लेकर आए थे जिसका नाम टाइगर रखा गया. समय बीतने के साथ टाइगर परिवार का अहम हिस्सा बन गया जिसकी एक मिनट की भी गैरमौजूदगी एक खालीपन सा महसूस कराती थी.
एक महीने पहले टाइगर की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी. उसने खाने-पीने से मुंह मोड़ लिया था. परिवार ने उसका इलाज भी कराया लेकिन ईश्वर की मरजी कुछ और थी और 28 फरवरी को बीमारी के चलते टाइगर की मौत हो गई. दीक्षित बताते हैं कि टाइगर के जाने के बाद उनके बड़े बेटे ने दो दिन तक खाना नहीं खाया.
परिजनों ने बताया कि टाइगर मोहल्ले में काफी लोकप्रिय था. उसकी मौत की खबर मिलते ही आसपास के लोग घर पर पहुंच गए और इसके बाद पूरे सम्मान के साथ उसकी शव यात्रा सजाई गई और मोहल्ले में उसकी शव यात्रा निकाली गई. बाद में बुलंदशहर के राजघाट पर उसका अंतिम संस्कार किया गया.
यही नहीं पूरे परिवार ने टाइगर की मौत के शोक में मुंडन भी कराया. घनश्याम दीक्षित बताते हैं कि टाइगर को मोहल्ले वाले तिलकधारी कहते थे क्योंकि उसे रोज तिलक लगाया जाता था. उन्होंने कहा टाइगर की वफादारी, अपनापन और मासूमियत आज भी परिवार के हर सदस्य की यादों में जिंदा है. घनश्याम दीक्षित ने कहा कि टाइगर के जाने के बाद घर में एक अजीब सा खालीपन महसूस किया जा रहा है.