जिस दिन आजाद हुआ भारत, उसी दिन जन्मीं 'विजय'; जानिए वीर चक्र विजेता की पत्नी की अनोखी कहानी
लखनऊ की विजय कुमारी का जन्म 15 अगस्त 1947 की आधी रात वाराणसी में हुआ था. देश की आजादी के साथ जन्मी विजय का परिवार पीढ़ियों से सेना और देशसेवा से जुड़ा रहा.
लखनऊ: 15 अगस्त भारत के लिए आजादी का दिन है, लेकिन लखनऊ की विजय कुमारी के लिए यह उनकी जिंदगी का भी सबसे खास दिन है. उनका जन्म ठीक उसी रात हुआ, जब देश ब्रिटिश शासन से मुक्त हुआ. आज 79 वर्ष की विजय जब अपनी जन्मतिथि बताती हैं तो चेहरे पर गर्व साफ दिखाई देता है. उनके जीवन की कहानी केवल संयोग की नहीं, बल्कि देशसेवा से जुड़े एक पूरे परिवार की कहानी है. उनके पति को 1965 के युद्ध में वीर चक्र मिला था.
विजय कुमारी का जन्म वाराणसी में 15 अगस्त 1947 की आधी रात हुआ था. उसी समय जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत में तिरंगा फहराया और अपना ऐतिहासिक भाषण दिया. उनके पिता ने देश की आजादी और इस खास मौके को ध्यान में रखते हुए उनका नाम विजय रखा. बचपन में स्कूल के कार्यक्रमों, प्रभात फेरियों और स्वतंत्रता दिवस समारोहों के बीच उनका जन्मदिन भी मनाया जाता था. माता-पिता उन्हें बताते थे कि उनका जन्मदिन पूरे देश का जन्मदिन है.
पति ने युद्ध में दिखाई अदम्य बहादुरी
विजय कुमारी की शादी मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह से हुई थी, जो कुमाऊं रेजिमेंट में अधिकारी थे. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने असाधारण साहस दिखाया. युद्ध के दौरान माइन विस्फोट में उनका एक पैर चला गया, लेकिन उन्होंने अभियान जारी रखा और दुश्मन की तोपों को निशाना बनाया. उनकी बहादुरी के लिए उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार वीर चक्र से सम्मानित किया गया. उनके मेडल और राष्ट्रपति की ओर से भेजा गया टेलीग्राम आज भी परिवार के लिए अनमोल हैं.
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परिवार की नसों में देशसेवा
विजय कुमारी का परिवार भी सेना से गहराई से जुड़ा रहा. उनके दो बेटे 1988 और 1989 में सेना में अधिकारी बने. एक पोते को 2016 में सेना में कमीशन मिला, जबकि दूसरा महू में सैन्य प्रशिक्षण ले रहा है. उनका एक बेटा डेंटिस्ट है और एक बेटी भी है. विजय गर्व से कहती हैं कि उनके परिवार ने जीवन का बड़ा हिस्सा देश की सेवा में लगाया. पति ने अपने बेटों को भी सेना में जाने के लिए प्रेरित किया.
मुश्किल दौर में भी देश के साथ
1965 की जंग के बाद विजय के परिवार ने कई कठिन दौर देखे. 1966 में मेजर सिंह को कृत्रिम पैर लगाया गया, लेकिन 1971 में उन्हें चिकित्सकीय रूप से सेना के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया. इसके बावजूद उन्होंने परिवार और बच्चों का हौसला बनाए रखा. विजय को वह समय भी याद है, जब अनाज संकट के दौरान लाल बहादुर शास्त्री की अपील पर उनके परिवार ने रोजाना एक समय भोजन छोड़ने का फैसला किया था.
15 अगस्त अब भी सबसे खास दिन
मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह का 4 अप्रैल 2025 को दिल्ली के आर्मी रिसर्च एंड रेफरल हॉस्पिटल में निधन हो गया. उनके जाने के बाद भी विजय के पास उनकी बहादुरी और देशसेवा की यादें हैं. उनके लिए 15 अगस्त केवल जन्मदिन नहीं, बल्कि उस देश के जन्म का दिन भी है, जिससे उनका जीवन हमेशा जुड़ा रहा. आज 79 साल की उम्र में भी वह अपनी कहानी का अंत उसी भाव के साथ करती हैं, जो उनके लिए सबसे खास है - जय हिंद.