राजस्थान का वह मंदिर, जहां मां दुर्गा की पूजा करता है मुस्लिम परिवार, जानिए सदियों पुरानी परंपरा

राजस्थान के जोधपुर जिले के बागोरिया गांव में स्थित माता रानी का एक प्राचीन मंदिर धार्मिक सद्भाव और इंसानियत की अनूठी पहचान बना हुआ है. यहां सदियों से एक मुस्लिम परिवार पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभा रहा है.

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Shanu Sharma

भारत अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. यहां अलग-अलग धर्मों और परंपराओं को मानने वाले लोग अपने-अपने आराध्य की पूजा करते हैं. लेकिन राजस्थान के जोधपुर जिले में स्थित एक ऐसा मंदिर भी है, जहां धर्म की सीमाएं पीछे छूट जाती हैं और इंसानियत सबसे बड़ी पहचान बनकर सामने आती है. 

जोधपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्र भोपालगढ़ के बागोरिया गांव की पहाड़ी पर स्थित माता रानी का यह प्राचीन मंदिर दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. कठिन चढ़ाई के बावजूद प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. नवरात्र और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है.

देश की साझा संस्कृति की झलक

मंदिर परिसर में एक ऐसा दृश्य देखने को मिलता है, जो देश की साझा संस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है. जहां एक ओर हिंदू श्रद्धालु विधि-विधान से माता की आरती और पूजा करते हैं, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय के लोग भी पूरी श्रद्धा के साथ मन्नत मांगने और आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं. इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा इसकी पूजा व्यवस्था है. मंदिर की सेवा और पूजा-अर्चना का दायित्व एक मुस्लिम परिवार के पास है.


वर्तमान में जलालुद्दीन खां मंदिर की देखरेख और पूजा से जुड़ी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं. बताया जाता है कि उनके पूर्वज कई पीढ़ियां पहले सिंध क्षेत्र से यहां आए थे और बाद में यहीं बस गए. तब से लेकर आज तक उनका परिवार पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ माता की सेवा करता आ रहा है. स्थानीय ग्रामीण भी इस परंपरा का सम्मान करते हैं और इसे गांव की साझा विरासत मानते हैं. यही कारण है कि वर्षों से इस व्यवस्था को लेकर कभी किसी प्रकार का विवाद सामने नहीं आया.

एक चमत्कार से शुरू हुई परंपरा

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर की परंपरा की शुरुआत सदियों पहले हुई थी. कहा जाता है कि सिंध से गुजर रहे मुस्लिम व्यापारियों के एक काफिले का एक सदस्य रास्ता भटककर इस पहाड़ी पर पहुंच गया. भीषण गर्मी, भूख और प्यास से उसकी हालत बेहद खराब हो गई थी.

मान्यता है कि इसी दौरान मां दुर्गा की कृपा से उसकी जान बच गई. इस घटना को उसने ईश्वरीय चमत्कार माना और अपने जीवन को माता की सेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया. उसने यहीं रहकर मंदिर की सेवा शुरू की और समय के साथ यह परंपरा उसके परिवार की पहचान बन गई. आज भी उस व्यापारी के वंशज उसी समर्पण और श्रद्धा के साथ मंदिर की सेवा कर रहे हैं. यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव का भी प्रतीक माना जाता है.