न वेतन, न छुट्टी, न कोई स्वार्थ... 10 साल से अस्पताल में मरीजों की सेवा कर रहे हैं बठिंडा के 5 बुजुर्ग
बठिंडा के रामपुरा फूल में पांच सेवानिवृत्त बुजुर्ग पिछले 10 वर्षों से एक नेत्र अस्पताल में निःस्वार्थ सेवा दे रहे हैं. बिना किसी वेतन के वे मरीजों की सहायता कर समाजसेवा की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं.
बठिंडा: आज के समय में जहां अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के बाद आरामदायक जीवन बिताना पसंद करते हैं वहीं पंजाब के बठिंडा जिले के रामपुरा फूल के पांच वरिष्ठ नागरिकों ने समाजसेवा का अलग रास्ता चुना है. ये सभी पिछले एक दशक से संत त्रिवेणी गिरी पुनर्ज्योति आई अस्पताल में बिना किसी आर्थिक लाभ के सेवाएं दे रहे हैं. उनकी यह पहल न केवल मरीजों के लिए राहत का कारण बनी है बल्कि समाज में सेवा और समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण भी बन चुकी है.
सेवानिवृत्ति के बाद शुरू हुआ सेवा का सफर
इस पहल की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी. रामपुरा फूल के पूर्व मंडी सुपरवाइजर मिलवर्तन भंडारी अस्पताल में आने-जाने के दौरान मरीजों की परेशानियों को करीब से देखते थे. अस्पताल में सीमित स्टाफ होने के कारण कई लोगों को आवश्यक सहायता समय पर नहीं मिल पाती थी. विशेष रूप से बुजुर्ग मरीजों को पंजीकरण, जांच कक्ष तक पहुंचने और अन्य प्रक्रियाओं में कठिनाई होती थी. इन परिस्थितियों को देखते हुए भंडारी ने अपने कुछ सेवानिवृत्त साथियों के साथ मिलकर अस्पताल में नियमित सेवा देने का निर्णय लिया. धीरे-धीरे यह प्रयास एक संगठित स्वयंसेवी व्यवस्था में बदल गया जो आज भी लगातार जारी है.
मरीजों की हर जरूरत में बनते हैं सहायक
अस्पताल में इन स्वयंसेवकों की भूमिका केवल दिशा बताने तक सीमित नहीं है. वे मरीजों की पर्ची बनवाने उन्हें संबंधित विभागों तक पहुंचाने और आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने में मदद करते हैं. इसके अलावा असहाय और वृद्ध मरीजों को विशेष सहयोग दिया जाता है ताकि उन्हें किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े. अस्पताल में भीड़ बढ़ने के दौरान व्यवस्था बनाए रखने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. मरीज और उनके परिजन भी इन बुजुर्गों की सेवाओं की सराहना करते हैं क्योंकि उनकी सहायता से अस्पताल की प्रक्रियाएं अधिक सरल और सुगम बन जाती हैं.
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समाजसेवा को आगे बढ़ाने की तैयारी
इन पांचों वरिष्ठ नागरिकों का मानना है कि सेवा का कोई निर्धारित समय नहीं होता. उनका उद्देश्य भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में नेत्र स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना और अधिक लोगों को इस अभियान से जोड़ना है. वे गांवों में नेत्र जांच शिविरों के आयोजन और जागरूकता कार्यक्रमों को मजबूत बनाने की योजना पर भी काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि यदि समाज के अधिक लोग स्वयंसेवा के लिए आगे आएं तो जरूरतमंदों तक बेहतर सुविधाएं पहुंचाई जा सकती हैं. उनकी यह सोच साबित करती है कि सेवानिवृत्ति जीवन का अंत नहीं बल्कि समाज के लिए कुछ नया करने की शुरुआत भी हो सकती है.