कुंभ की वायरल मोनालिसा की शादी पर नया बवाल, पति पर लगा SC/ST एक्ट का मामला
मध्य प्रदेश पुलिस ने केरल हाई कोर्ट को बताया कि मोनालिसा भोसले के पति फरमान के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट की धारा भी जोड़ी गई है. पुलिस का कहना है कि इस स्थिति में अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती.
भोपाल: मध्य प्रदेश पुलिस ने शुक्रवार को केरल हाई कोर्ट को बताया कि कुंभ मेले में वायरल हुई मोनालिसा भोसले के पति फरमान के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत एक और केस जोड़ा गया है. पुलिस ने दलील दी कि इसलिए इस जोड़े की अग्रिम जमानत याचिका सुनवाई योग्य नहीं है.
इस जोड़े ने कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए अर्जी दी थी. यह केस मोनालिसा के पिता की शिकायत पर दर्ज किया गया था, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी बेटी का अपहरण कर लिया गया है. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ASG एस.वी. राजू ने जस्टिस कौसर एडाप्पागाथ की बेंच को बताया कि SC/ST एक्ट के प्रावधानों को देखते हुए, CrPC के तहत अग्रिम जमानत सुनवाई योग्य नहीं होगी.
कब भड़का विवाद?
इस शादी को लेकर तब एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने आरोप लगाया कि शादी के समय लड़की की उम्र करीब 16 साल थी और शादी करवाने के लिए शायद जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया था. इन तथ्यों के सामने आने के बाद, मध्य प्रदेश पुलिस ने फरमान के खिलाफ Pocso एक्ट के तहत एक केस दर्ज किया. फरमान पर 'लव जिहाद' के भी आरोप लगाए गए थे.
ASG ने कोर्ट को क्या बताया?
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान ASG ने कोर्ट को बताया, 'यह अपराध अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आता है. SC/ST एक्ट की धारा 18 के कारण, अग्रिम जमानत सुनवाई योग्य नहीं है. पीड़िता अनुसूचित जनजाति समुदाय से आती है, जबकि पहला याचिकाकर्ता SC/ST समुदाय से नहीं है.'
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद क्या कहा?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने इस जोड़े को गिरफ्तारी से बचाने वाले अंतरिम आदेश को 2 जून तक बढ़ा दिया और कहा कि यदि वह संशोधन याचिका को स्वीकार करने का निर्णय लेती है, तो वह आगे की दलीलें सुनेगी.
मध्य प्रदेश सरकार ने इससे पहले अग्रिम ज़मानत याचिका की स्वीकार्यता पर ही सवाल उठाते हुए तर्क दिया था कि नियमित अग्रिम जमानत याचिकाएं उसी राज्य की अदालतों में दायर की जानी चाहिए, जहां FIR दर्ज की गई हो. चूंकि यह मामला मध्य प्रदेश में दर्ज किया गया था, इसलिए राज्य सरकार ने तर्क दिया कि केरल उच्च न्यायालय इस याचिका पर सुनवाई नहीं कर सकता.