बागेश्वर धाम के कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को अब विदेशों से चंदा लेने की आधिकारिक इजाजत मिल गई है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनके संगठन ‘श्री बागेश्वर जन सेवा समिति गढ़ा’ को एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) के तहत पंजीकरण प्रदान कर दिया है. यह पंजीकरण ‘धार्मिक (हिंदू)’ श्रेणी में किया गया है. 29 वर्षीय शास्त्री ‘हिंदू राष्ट्र’ की स्थापना की वकालत करने और अपने भड़काऊ बयानों के कारण अक्सर सुर्खियों में रहते हैं. अब वे कानूनी तौर पर विदेशी दान स्वीकार कर सकेंगे.
एफसीआरए के तहत पंजीकरण किसी भी गैर-सरकारी संगठन या धार्मिक संस्था के लिए विदेशी चंदा लेने के लिए अनिवार्य है. यह पंजीकरण पांच साल के लिए वैध होता है, जिसके बाद नवीनीकरण कराना पड़ता है. बागेश्वर धाम को सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक के अलावा ‘धार्मिक (हिंदू)’ श्रेणी में मंजूरी मिली है. इसका मतलब यह हुआ कि अब धीरेंद्र शास्त्री का संगठन दुनिया भर से हिंदू धार्मिक कार्यों और समाजसेवा के लिए चंदा जुटा सकता है.
गृह मंत्रालय ने इस साल 15 अप्रैल तक कुल 38 संस्थाओं को विदेशी धन लेने की अनुमति दी है. इनमें से छह को ‘धार्मिक (हिंदू)’ श्रेणी में पंजीकरण मिला है. बागेश्वर धाम के अलावा इनमें पश्चिम बंगाल के बोलपुर और बिहार के पूर्णिया स्थित रामकृष्ण मिशन, दिल्ली का दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, कर्नाटक के धर्मस्थल का संस्थान और आगरा का राधा स्वामी सत्संग शामिल हैं. यानी शास्त्री अब इन बड़े धार्मिक संगठनों की श्रेणी में आ गए हैं.
गौरतलब है कि 2015 से अब तक 18,000 से अधिक एनजीओ के एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए जा चुके हैं. फिर भी केंद्र सरकार ने बागेश्वर धाम को यह मंजूरी दे दी. विपक्षी दलों ने सवाल उठाया है कि जहां एक तरफ सरकार ‘जबरन धर्मांतरण’ और ‘देश विरोधी गतिविधियों’ के नाम पर एफसीआरए रद्द कर रही है, वहीं विवादित बयानों के लिए मशहूर शास्त्री को विदेशी चंदे की इजाजत क्यों दी गई. हाल ही में सरकार ने एफसीआरए में संशोधन विधेयक पेश किया था, जिसे विपक्ष और कई राज्यों के विरोध के बाद स्थगित करना पड़ा.
द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार अक्सर गोपनीयता का हवाला देकर एफसीआरए रद्द करने के आधार साझा करने से इनकार कर देती है. कई बार प्रक्रियात्मक गलतियों या कर दाखिल न करने जैसे छोटे मामलों में भी एनजीओ के पंजीकरण रद्द हो जाते हैं. लेकिन बागेश्वर धाम जैसे संगठन को आसानी से मंजूरी मिल गई. आलोचकों का कहना है कि यह चयनात्मक व्यवहार है. फिलहाल, धीरेंद्र शास्त्री की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.