'यह लोकतंत्र है, हिटलर का शासन नहीं', महिला आरक्षण बिल गिरने पर बोले डीके शिवकुमार
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के लोकसभा में विफल होने को इंडिया गठबंधन और लोकतंत्र की जीत बताया है. उन्होंने केंद्र पर विपक्ष को विश्वास में न लेने और दक्षिण भारत के राजनीतिक प्रभाव को कम करने की साजिश का गंभीर आरोप लगाया है.
नई दिल्ली: कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर केंद्र की भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली और समय पर कड़े सवाल उठाए हैं. बेंगलुरु में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इस महत्वपूर्ण विधेयक पर विपक्षी दलों को भरोसे में नहीं लिया. शिवकुमार ने सख्त लहजे में कहा, 'यह लोकतंत्र है, यह हिटलर शैली का शासन नहीं है. वे चुनाव के बीच में इस तरह का बिल लाकर पूरे निर्वाचन क्षेत्रों को बदलने की कोशिश नहीं कर सकते.'
उन्होंने जोर देकर कहा कि एक लोकतांत्रिक ढांचे में व्यापक परामर्श की आवश्यकता होती है, जिसे केंद्र ने पूरी तरह दरकिनार कर दिया. उपमुख्यमंत्री के अनुसार, यह विपक्षी दलों की एकजुटता का ही परिणाम है कि सरकार की इस 'मनमानी' को रोका जा सका, जिसे उन्होंने 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन की एक बड़ी जीत करार दिया.
लोकसभा में विधेयक की हार और परिसीमन का गणित
गौरतलब है कि शुक्रवार को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पारित नहीं हो सका. इस विधेयक के माध्यम से सरकार का लक्ष्य 2029 के विधानसभा और संसदीय चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना था. इसके लिए 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की योजना थी, जिससे लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 816 की जानी थी.
सदन में मतदान के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सदस्यों ने इसके विरोध में मतदान किया. संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत (352 वोट) न मिल पाने के कारण यह विधेयक गिर गया.
दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व पर खतरे का आरोप
शिवकुमार ने परिसीमन के बहाने क्षेत्रीय असंतुलन पैदा करने की कोशिशों पर चिंता जताई. उन्होंने आरोप लगाया कि बिना सलाह-मशविरे के निर्वाचन क्षेत्रों को फिर से तैयार करने की यह कोशिश उत्तर भारत को अधिक राजनीतिक वजन देने और दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व को कम करने की एक चाल है. उन्होंने स्पष्ट किया कि दक्षिण भारत का कोई भी नागरिक इसे बर्दाश्त नहीं करेगा.
भाजपा द्वारा कांग्रेस को 'महिला-विरोधी' बताने के दावों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं किसी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की संपत्ति हैं. उन्होंने याद दिलाया कि कांग्रेस ने ही इसे राज्यसभा में पारित कराया था और स्थानीय निकायों में पहले ही 50 प्रतिशत आरक्षण दिया है. राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और एम.के. स्टालिन सहित दक्षिण भारत के कई मुख्यमंत्रियों ने भी इस कदम का विरोध करते हुए इसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक बताया है.