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दिल्ली बनेगी कला का बड़ा मंच, लाल किले से कुतुब मीनार तक दिखेगी कला की चमक; दिखेंगी देश-विदेश की कलाकृतियां

‘तत् त्वम् असि’ यानी ‘वह तुम हो’ उपनिषदों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण अवधारणा है. इसी विचार से प्रेरित होकर द्विवार्षिक आयोजन के दूसरे संस्करण को दिल्ली के अलग अलग ऐतिहासिक और धरोहर स्थलों तक ले जाने की तैयारी है.

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Babli Rautela

भारतीय दर्शन और आधुनिक कला के मेल को एक बड़े मंच पर पेश करने की तैयारी है. ‘तत् त्वम् असि’ की अवधारणा से प्रेरित द्विवार्षिक आयोजन के दूसरे संस्करण को इस बार दिल्ली के अलग अलग हिस्सों और ऐतिहासिक धरोहर स्थलों तक ले जाने की योजना बनाई जा रही है. ‘तत् त्वम् असि’ उपनिषदों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विचार है. इसका सामान्य अर्थ ‘वह तुम हो’ माना जाता है. यह विचार व्यक्ति और व्यापक अस्तित्व के बीच संबंध की ओर संकेत करता है. इसी दार्शनिक सोच को इस आयोजन की थीम का आधार बनाया गया है.

ऐतिहासिक स्थलों से जुड़ेगा कला का आयोजन

दूसरे संस्करण की खास बात यह होगी कि कला को किसी एक स्थान तक सीमित रखने के बजाय दिल्ली के विभिन्न हिस्सों और ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंचाया जाएगा. इसके लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और संस्कृति मंत्रालय के साथ मिलकर काम करने की तैयारी है.योजना के तहत संरक्षित स्मारकों को समकालीन रचनात्मक गतिविधियों के साथ जोड़ा जाएगा. इससे दर्शकों को ऐतिहासिक धरोहरों के बीच आधुनिक कला को देखने और समझने का अवसर मिलेगा.

धरोहर स्थलों पर प्रदर्शित होंगी कलाकृतियां

संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल के अनुसार, इस द्विवार्षिक आयोजन में राष्ट्रीय राजधानी के प्रमुख ऐतिहासिक धरोहर स्थलों पर कलाकृतियां प्रदर्शित की जाएंगी. इसका उद्देश्य कला, इतिहास और भारतीय विचार परंपरा के बीच एक संवाद तैयार करना है. आयोजन को दिल्ली के अलग अलग ऐतिहासिक स्थानों तक ले जाने से कला प्रेमियों और आम दर्शकों को भी अलग तरह का अनुभव मिलने की उम्मीद है. ऐतिहासिक स्मारकों की पृष्ठभूमि में समकालीन कलाकृतियों की प्रस्तुति इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी.


आत्म निरीक्षण- व्यापक चेतना पर जोर

इस वर्ष की थीम भारत की प्राचीन परंपराओं और आध्यात्मिक विचारों से प्रेरित है. इसमें आत्म निरीक्षण यानी खुद को समझने और व्यापक चेतना के साथ अपने संबंध को देखने पर जोर दिया गया है. ‘तत् त्वम् असि’ का विचार इसी संबंध को सामने रखता है कि व्यक्ति और व्यापक अस्तित्व को पूरी तरह अलग अलग देखने के बजाय उनके बीच एक गहरे संबंध को समझा जाए.

इस तरह आयोजन में भारतीय दर्शन की पुरानी विचारधारा और आज की समकालीन कला को एक साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की जाएगी. दिल्ली के ऐतिहासिक स्थलों को इस पहल से जोड़ने के कारण यह आयोजन कला के साथ साथ भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को समझने का भी एक माध्यम बन सकता है.