नाग पंचमी पर यहां लगती है नागों की अदालत, सुनकर रह जाएंगे हैरान

जशपुर के सिटोंगा गांव में नाग पंचमी पर लगने वाला नाग दरबार लोकविश्वास और प्रकृति से जुड़ी अनोखी परंपरा है. यहां बांकी और श्री को नाग-नागिन के रूप में पूजने की मान्यता है.

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Meenu Singh

छत्तीसगढ़ के जशपुरनगर के पास सिटोंगा गांव में नाग पंचमी का पर्व एक अलग ही रंग में दिखाई देता है. खेतों के बीच बने छोटे नागदेव मंदिर में हर साल श्रद्धालु बांकी और श्री की पूजा करने पहुंचते हैं. स्थानीय मान्यता इन्हें भाई बहन के रूप में याद करती है, जिनके सर्प रूप लेने के बाद दो नदियों के उद्गम की कहानी जुड़ी है. नाग दरबार में श्रद्धालुओं पर नागदेव के आने की मान्यता भी लोगों का ध्यान खींचती है.

भाई बहन से जुड़ी है लोककथा

मंदिर के पुजारी लहरू बाबा के अनुसार, यहां स्थापित प्रतिमाएं बांकी और श्री नाम के भाई बहन की मानी जाती हैं. लोककथा के मुताबिक दोनों सौतेली मां की परेशानियों से दुखी थे. एक दिन खेत में सांप के दो अंडे खाने के बाद उनके शरीर में बदलाव आया और वे सर्प रूप में बदल गए. इसके बाद दोनों खेत के कुंड में चले गए और वहां से अलग-अलग दिशाओं में निकल पड़े.

नदियों के उद्गम से जुड़ा विश्वास

स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, जिस कुंड में दोनों भाई बहन छिपे थे, वहीं से बांकी और श्री नदियों की धारा निकली. बांकी पश्चिम दिशा में और श्री पूर्व दिशा की ओर चले गए. इसी मान्यता के आधार पर दोनों को नाग नागिन के रूप में मंदिर में पूजा जाता है. नाग पंचमी के अवसर पर यहां विशेष आयोजन होता है और आसपास के गांवों से भी लोग दर्शन के लिए पहुंचते हैं.


नागदेव के आने की मान्यता

सिटोंगा के नाग दरबार से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यता श्रद्धालुओं पर नागदेव के सवार होने की है. पूजा शुरू होने के बाद कुछ श्रद्धालुओं के व्यवहार में बदलाव दिखाई देने की बात कही जाती है. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि उस समय नागदेव उनके माध्यम से दर्शन देते हैं. यह परंपरा यहां के नाग पंचमी आयोजन को अन्य स्थानों से अलग पहचान देती है.

कुंड में स्नान के बाद शांत होने की मान्यता

स्थानीय मान्यता के अनुसार, जिन श्रद्धालुओं पर नागदेव के आने की बात कही जाती है, उन्हें नदी के पास मौजूद कुंड में स्नान कराया जाता है. इसके बाद दूध पिलाने की परंपरा भी बताई जाती है. लोगों का विश्वास है कि इससे वे शांत हो जाते हैं. आस्था से जुड़ी यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही लोककथा और ग्रामीण धार्मिक विश्वासों का हिस्सा बनी हुई है.