अब आपकी आवाज से डिप्रेशन का चलेगा पता, AIIMS की स्टडी में बड़ा दावा; इलाज में गेमचेंजर हो सकती है ये खोज
एम्स दिल्ली के शोध में सामने आया है कि किसी व्यक्ति की आवाज, टोन और बोलने के तरीके से अवसाद के शुरुआती संकेत मिल सकते हैं. यह तकनीक समय रहते पहचान में मददगार हो सकती है.
नई दिल्ली: दुनिया भर में करोड़ों लोग डिप्रेशन की समस्या से जूझ रहे हैं. यह एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसे समय पर पहचानना अक्सर आसान नहीं होता. कई बार व्यक्ति अंदर ही अंदर इस परेशानी से गुजरता रहता है, लेकिन परिवार और दोस्तों को इसकी भनक तक नहीं लगती. जब समय पर मदद नहीं मिलती, तो हालात बिगड़ सकते हैं और कुछ लोग आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम भी उठा लेते हैं.
लंबे समय से डिप्रेशन को शुरुआती चरण में पकड़ना एक बड़ी चुनौती रहा है. अब दिल्ली एम्स में की गई एक नई रिसर्च ने इस दिशा में उम्मीद जगाई है. शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी व्यक्ति की आवाज, बोलने के तरीके और टोन के जरिए डिप्रेशन के शुरुआती संकेत पहचाने जा सकते हैं. यह तकनीक समय रहते समस्या को समझने और मदद पहुंचाने में कारगर साबित हो सकती है.
मानसिक स्वास्थ्य जांच का नया रास्ता
अवसाद (डिप्रेशन) की बढ़ती समस्या के बीच एम्स दिल्ली में चल रहे एक शोध ने मानसिक स्वास्थ्य जांच का नया रास्ता दिखाया है. शोधकर्ताओं के अनुसार, किसी व्यक्ति की आवाज, बोलने की गति, भावनात्मक उतार-चढ़ाव और ऊर्जा से डिप्रेशन के शुरुआती लक्षण पहचाने जा सकते हैं. यह तरीका खास तौर पर उन इलाकों में उपयोगी हो सकता है, जहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित है.
स्पीच हेल्थ लैब में हुआ अध्ययन
एम्स दिल्ली में सीएसआर सहयोग से स्थापित अत्याधुनिक स्पीच हेल्थ लैब में यह अध्ययन किया गया. शोध में 423 प्रतिभागियों के भाषण नमूनों का विश्लेषण किया गया, जिनके पास पूरे क्लिनिकल और डेमोग्राफिक रिकॉर्ड मौजूद थे. प्रतिभागियों की औसत उम्र लगभग 24 साल थी. अधिकांश प्रतिभागी 18 से 25 वर्ष के आयु वर्ग से थे.
युवाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा
आंकड़ों के अनुसार, करीब दो तिहाई प्रतिभागी 23 वर्ष से कम उम्र के थे और लगभग 75 प्रतिशत 25 वर्ष से कम. इससे साफ होता है कि युवा वर्ग स्पीच आधारित मानसिक स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म से ज्यादा जुड़ रहा है. हालांकि, उम्र बढ़ने के साथ भागीदारी में गिरावट देखी गई, खासकर 35 वर्ष के बाद.
डिप्रेशन की पहचान में सटीकता
मानक मानसिक स्वास्थ्य जांच में लगभग 32 प्रतिशत प्रतिभागियों में clinically significant अवसाद के लक्षण पाए गए. जब इन नतीजों को ऑटोमेटेड स्पीच एनालिसिस से जोड़ा गया, तो 60 से 75 प्रतिशत तक सटीकता मिली. लंबे भाषण नमूनों में यह सटीकता करीब 78 प्रतिशत तक पहुंच गई.
आवाज में दिखते हैं बदलाव
शोध में भाषाई और पारालिंग्विस्टिक संकेतकों का अध्ययन किया गया. इनमें फ्लुएंसी, उच्चारण, टोन, पिच, भावनात्मक गहराई और वोकल एनर्जी शामिल हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि अवसाद के कारण बोलने की गति धीमी हो जाती है, आवाज सपाट हो जाती है और ऊर्जा कम दिखती है.
इलाज का विकल्प नहीं, सहायक तरीका
एम्स दिल्ली के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार के अनुसार, यह तकनीक इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि शुरुआती स्क्रीनिंग और रेफरल का सहायक साधन है. वैश्विक स्तर पर 26.4 करोड़ से अधिक लोग अवसाद से प्रभावित हैं. भारत में भी स्थिति चिंताजनक है, इसलिए समय पर पहचान बेहद जरूरी है.