भविष्य में जिंदा होने की आस में अपनी डेड बॉडी फ्रीज करा रहे लोग? जानिए क्या है रहस्यमयी क्रायोनिक्स तकनीक
क्रायोनिक्स तकनीक के जरिए लोग भविष्य में दोबारा जीवित होने की उम्मीद में अपने शरीर या मस्तिष्क को बेहद ठंडे तापमान पर फ्रीज करवा रहे हैं. विज्ञान और अटूट विश्वास के बीच झूलती यह तकनीक मौत को 'अंतिम सत्य' के बजाय केवल एक 'रुकावट' मानती है.
नई दिल्ली: जहां दुनिया का एक बड़ा हिस्सा मौत को जीवन का अंतिम पड़ाव मानता है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसे केवल एक तकनीकी बाधा समझते हैं. विज्ञान की एक अनोखी और विवादित शाखा, जिसे क्रायोनिक्स कहा जाता है, आज तेजी से चर्चा का विषय बन रही है. इस तकनीक के समर्थक अपने शरीर या केवल अपने मस्तिष्क को भविष्य के लिए संरक्षित कर रहे हैं, इस उम्मीद के साथ कि सदियों बाद जब विज्ञान और चिकित्सा तंत्र बेहद उन्नत हो जाएगा, तो उन्हें फिर से जीवित किया जा सकेगा.
क्रायोनिक्स की प्रक्रिया किसी व्यक्ति की कानूनी मृत्यु घोषित होने के तुरंत बाद शुरू होती है. इसमें शरीर को तेजी से ठंडा किया जाता है और खून की जगह विशेष रसायन, जिन्हें क्रायो-प्रोटेक्टेंट कहते हैं, भरे जाते हैं. इसका मुख्य उद्देश्य कोशिकाओं के भीतर बर्फ बनने से रोकना है, जो ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकती है. इसके बाद शरीर को -196 डिग्री सेल्सियस के तरल नाइट्रोजन में विट्रिफिकेशन (कांच जैसी अवस्था) में जमाकर सुरक्षित रख दिया जाता है.
अल्कोर और क्रायोनिक्स इंस्टीट्यूट: भविष्य के संरक्षक
वर्तमान में इस क्षेत्र में अमेरिका की दो प्रमुख संस्थाएं सक्रिय हैं, एरिजोना स्थित अल्कोर लाइफ एक्सटेंशन फाउंडेशन और मिशिगन का क्रायोनिक्स इंस्टीट्यूट. आंकड़ों के अनुसार, 2026 तक दुनिया भर में 500 से अधिक लोग इस प्रक्रिया के तहत संरक्षित किए जा चुके हैं, जबकि हजारों ने भविष्य के लिए पंजीकरण कराया है. अल्कोर जैसी संस्थाएं 'न्यूरो-प्रिजर्वेशन' का विकल्प भी देती हैं, जहां केवल मस्तिष्क को सुरक्षित रखा जाता है, क्योंकि व्यक्तित्व और चेतना का केंद्र वही है.
करोड़ों का खर्च और लाइफ इंश्योरेंस का सहारा
यह 'भविष्य का जीवन बीमा' सस्ता नहीं है. पूरे शरीर को संरक्षित कराने का खर्च लगभग 1.5 से 2 करोड़ रुपये (2 लाख डॉलर) तक आता है, जबकि केवल दिमाग के लिए यह राशि 60-70 लाख रुपये तक हो सकती है. इतने बड़े खर्च के लिए लोग अक्सर जीवन बीमा की किस्तों का सहारा लेते हैं.
आलोचक इसे अव्यवहारिक और महंगा सपना करार देते हैं. सबसे बड़ी चुनौती फ्रीजिंग के दौरान कोशिकाओं को होने वाला नुकसान है. हालांकि रिसर्चर राल्फ मर्कल जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में नैनो-रोबोट्स और स्टेम सेल तकनीक से इस नुकसान की भरपाई संभव हो सकेगी. क्रायोनिक्स का इतिहास 1967 से शुरू होता है, जब जेम्स बेडफोर्ड पहले ऐसे व्यक्ति बने जिन्हें संरक्षित किया गया. आज भी उनका शरीर सुरक्षित है, जो इस उम्मीद की लौ को जलाए हुए है कि विज्ञान एक दिन असंभव को संभव कर दिखाएगा.