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क्या इन 7 बीजों से मिली थी भारत को अपनी ‘Coffee’? इस सूफी संत ने डाली कॉफी की नींव!

अगर आप कॉफी पीते हैं, तो आपको उसकी हिस्ट्री भी जान लेनी चाहिए कि आखिर कॉफी का इजाद हुआ कहां से. कॉफी को लेकर कई कहानियां मौजूद हैं, जिनमें से एक के बारे में हम आपको यहां बता रहे हैं.

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Shilpa Srivastava

नई दिल्ली: कॉफी जरूरी है… ये हम नहीं कह रहे, बल्कि कई लोग कहते हैं. जिस तरह से कुछ लोगों को सुबह उठकर चाय चाहिए होती है, उसी तरह से कई लोग ऐसे हैं, जो कॉफी के बिना अपना दिन शुरू नहीं कर पाते हैं. जिन लोगों कॉफी पसंद होती है, उन्हें उसके बारे में जानने का भी शौक होता है. इस शौक से याद आया, क्या आप ये जानते हैं कि भारत में आखिर कॉफी आई कहां से? 

भारत में कॉफी के अस्तित्व को लेकर कई सवाल हैं. कई लोगों को कहना है कि इसे यहीं पर ऊगाना शुरू किया गया है तो कई लोगों का कहना है कि इसे चुराकर लाया गया था. अगर भारत में इसकी मार्केट वैल्यू की बात की जाए तो  भारत का कॉफी मार्केट 2034 तक लगभग $17.31 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है. इतने बड़े कॉफी मार्केट को लेकर जो कहानियां मौजूद हैं, उनमें से एक के बारे में हम आपको यहां बता रहे हैं.

7 बीजों ने बदल दी थी पूरी कहानी: 

आज कैपेचिनो और कोल्ड ब्रू काफी फेमस है, लेकिन इनके आने से पहले कॉफी का सफर इथियोपिया के ऊंचे इलाकों से शुरू हुआ. फिर ये अरब से गुजरा और यमन की संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन गया. 15वीं सदी तक मोचा बंदरगाह कॉफी बिजनेस का पर्याय बन चुका था. यहां जो बीज उगाए जाते थे, उन पर कड़ी नजर रखी जाती थी. वहीं, भारत के मसालों के चलते भारत दुनियाभर के बिजनेस का एक बड़ा केंद्र बना हुआ था, लेकिन कॉफी भारत के लिए नॉर्मल नहीं थी. इसे पिए जाना और उगाए जाना, दो अलग बातें थीं.

बाबा बुदन ने ने बदल दी थी स्थिति:

बाबा बुदन नाम के एक सूफी संत थे, जिन्होंने इस स्थिति को पूरी तरह से बदल दिया था. 17वीं सदी में, बाबा बुदन के बारे में कहा जाता है कि मक्का से लौटते समय उन्होंने यमन के मोचा बंदरगाह से अपनी दाढ़ी में सात कच्चे बीज छिपाए और उन्हें चोरी छिपे भारत ले आए. उस समय यमन के लोग कॉफी को केवल रोस्टेड या बेक्ड फॉर्म में ही निर्यात करते थे, जिससे कोई और उसे उगा न सके और उसकी मोनोपोली बनी रहे. बाबा बुदन ने 7 बीजों को इसलिए चुना क्योंकि इस्लाम में ये नंबर काफी अहम माना जाता है. 

7 बीजों से हुआ भारत में कॉफी का जन्म: 

इन चुराए हुए 7 बीजों से भारत में कॉफी का जन्म हुआ. ये पौधे खूब फले-फूले, जिन पहाड़ियों में ये उगाए गए थे, उन्हें बाद में बाबा बुदन हिल्स (कर्नाटक) कहा जाने लगा. कफी की संभावनाओं को सबसे पहले डच लोगों ने पहचाना. डच ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए, उन्होंने कॉफी की खेती को बढ़ाया गया. इसके तहत भारत में उगाई गई कॉफी का शुरुआती निर्यात शुरू किया गया. फिर अंग्रेजों ने इस इंडस्ट्री को पूरी तरह से बदलकर रख दिया. 

19वीं सदी की शुरुआत तक, ब्रिटिश बागान मालिकों ने बड़े पैमाने पर पूरे दक्षिण भारत में कॉफी उगानी शुरू कर दी. केरल में वायनाड, तमिलनाडु में नीलगिरी और कर्नाटक की पहाड़ियों जैसे इलाके इसके मुख्य सेंटर बन गए. इसके बाद से कॉफी एक कमोडिटी बन चुकी थी. समय के साथ इस पर रिचर्स की गई और इसके बिजनेस के रास्ते बढ़ने लगे. भारतीय कॉफी ने यूरोपीय बाजारों तक अपनी पहुंच बना ली. 

कुछ इस तरह बदल गए कॉफी के बीज: 

फिर कुछ ऐसा हुआ जिससे कॉफी के बीज बदल गए. कॉफी के बीज के मानसून की हवाओं और नमी के संपर्क में आने से, बीजों ने नमी सोख ली. इस स्थिति में बीज फूल गए और उनमें एक अनोखा स्वाद विकसित हो गया. यह संयोग से शुरू हुआ था, लेकिन फिर यह एक तरीका बना लिया गया. इस प्रक्रिया को मॉनसूनिंग के नाम से जाना जाता है. इससे मशहूर मॉनसून्ड मालाबार कॉफी तैयार की जाती है. इस कॉफी में हल्के और मिट्टी जैसा स्वाद आता है, जिससे इसे काफी पसंद किया जाता है.

भारत ने विकसित किया कॉफी का नया तरीका: 

कॉफी के पौधों को पेड़ों की घनी छांव के नीचे उगाना शुरू किया गया. यहां पर अक्सर उनके साथ इलायची, काली मिर्च और जायफल जैसे मसाले भी उगाए जाते हैं. इस तरीके से पौधे सुरक्षित तो रहते थे और साथ ही इसे कई फायदे भी मिलते थे. यह कॉफी के पकने के प्रोसेस को धीरे कर देते थे. इससे उसमें मौजूद शुगर को पूरी तरह से विकसित होने का समय मिल जाता है. इसका नतीजा यह होता है कि कॉफी का स्वाद एकदम बैलेंस्ड निकलकर आता है.