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एक महीने बाद अमेरिका ने ईरान पर किया हमला, तेहरान का मिसाइलों से जोरदार पलटवार

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. अमेरिका ने रविवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थित ईरान के लारक द्वीप पर हमला किया. अमेरिकी सेना ने यहां ईरान के दो रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया.

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Shilpa Srivastava

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. अमेरिका ने रविवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थित ईरान के लारक द्वीप पर हमला किया. अमेरिकी सेना ने यहां ईरान के दो रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया. करीब एक महीने बाद ईरान के खिलाफ अमेरिका की यह पहली सैन्य कार्रवाई बताई जा रही है. इसके बाद ईरान ने भी पलटवार किया.

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के जवान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री बारूदी सुरंगें यानी सी-माइंस डालने की तैयारी कर रहे थे. इसके लिए रॉकेट लॉन्चरों का इस्तेमाल किया जा सकता था. अमेरिका ने दावा किया कि इन लॉन्चरों को नष्ट करने का उद्देश्य समुद्री रास्ते में और सी-माइंस बिछाने से रोकना था. इससे पहले अमेरिकी सेना ने अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए इस्तेमाल होने वाले रास्तों से सी-माइंस हटाने का अभियान पूरा करने की जानकारी दी थी.

ईरान ने जॉर्डन में किया पलटवार:

अमेरिकी हमले के बाद ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने जवाबी कार्रवाई की. ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, ईरान ने जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. रिपोर्ट के अनुसार, किंग हुसैन और अल-अज्राक एयरबेस को निशाना बनाया गया. इन ठिकानों पर तकनीकी सुविधाएं, विमानों की मरम्मत से जुड़ी जगहें और अमेरिकी लड़ाकू विमानों की स्थिति शामिल थी. ईरानी मीडिया ने हमले में भारी नुकसान होने का दावा किया है. हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है.


स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है. युद्ध से पहले दुनिया के करीब पांचवें हिस्से के तेल की आवाजाही इसी रास्ते से होती थी. ईरान द्वारा इस रास्ते को प्रभावी रूप से बंद किए जाने से तेल और ऊर्जा की कीमतों पर असर पड़ा है. इसके अलावा खाद और ऊर्जा की उपलब्धता को लेकर भी कई जगह चिंता बढ़ी है.

अमेरिका का आर्थिक दबाव भी जारी:

अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ आर्थिक दबाव भी बढ़ाया है. अमेरिकी प्रशासन इसे आर्थिक युद्ध का हिस्सा बता रहा है. ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी के कारण देश में पेट्रोल की आपूर्ति पर दबाव बढ़ने की बात कही गई है. दूसरी तरफ, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों की मदद से दोनों पक्षों के बीच बातचीत की कोशिश भी जारी रही है. अप्रैल में युद्धविराम हुआ था और जून में अंतिम शांति समझौते की दिशा में एक समझौता भी हुआ, लेकिन अभी तक स्थायी शांति समझौता नहीं हो पाया है.