ईरान में मातम, अमेरिका में जश्न: खामेनेई के जनाजे के बीच ट्रंप का विवादित बयान, जानें क्या है पूरा मामला?

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का जनाजा तेहरान से मशहद तक निकला, लाखों शिया अपने नेता की हत्या का मातम मना रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ अमेरिका 250वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. इसी बीच ट्रंप ने ईरान पर ‘जीत’ का दावा किया, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है.

@BRICSinfo
Sagar Bhardwaj

आज दुनिया दो बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें देख रही है. एक तरफ ईरान में पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार का मातमी माहौल है, तो दूसरी ओर अमेरिका अपनी आजादी के 250 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है. ये दोनों घटनाएं अपने आप में इतनी बड़ी हैं कि पूरी दुनिया की निगाहें इन पर टिकी हैं. लेकिन इन दोनों घटनाओं के बीच एक ऐसा संबंध है, जो वैश्विक राजनीति और सत्ता की चालों को उजागर करता है.

ईरान की सड़कों पर लाखों लोग उमड़ पड़े हैं. वे सभी अपने पूर्व नेता अली खामेनेई को अंतिम विदाई देने के लिए निकले हैं. तेहरान से शुरू हुआ यह जनाजा क्रमशः कुम, इराक के नजफ, कर्बला और अंत में ईरान के मशहद पहुंचेगा, जहां उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा. इस भीड़-भाड़ भरे माहौल में लोग छाती पीटकर मातम मना रहे हैं और ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ तथा ‘बदला’ लेने के नारे लगा रहे हैं.

दूसरी तरफ अमेरिका में 4 जुलाई का जश्न अपने चरम पर है. वॉशिंगटन डीसी के नेशनल मॉल में भव्य समारोह आयोजित हुए. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र को संबोधित किया. उन्होंने कम्युनिज्म पर तीखा हमला बोला और कहा कि उनके देश में कम्युनिस्टों का कोई स्थान नहीं है. इसके बाद 40 मिनट तक चले आतिशबाजी के शो में 8.5 लाख से अधिक फायरवर्क्स किए गए, जिसे व्हाइट हाउस ने अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा स्वतंत्रता दिवस फायरवर्क शो बताया.


ईरान में अंतिम संस्कार: एक ऐतिहासिक घटना

अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार केवल एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक घटना है. ईरानी सरकार के अनुमान के अनुसार, इस जनाजे में 1.5 से 2 करोड़ लोग शामिल हो रहे हैं. यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि ईरान में खामेनेई का कितना बड़ा जनाधार था. उनके तीन बेटे मसूद, मेयसम और मुस्तफा इस जनाजे में शामिल हुए, जबकि उनके उत्तराधिकारी और बेटे मुजतबा खामेनेई सुरक्षा कारणों से दूर रहे. ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायल से जान का खतरा होने के कारण उन्होंने सार्वजनिक रूप से अंतिम संस्कार में भाग नहीं लिया.

इस जनाजे में रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के कमांडर अहमद वाहिदी भी मौजूद रहे. भीड़ में कुछ लोगों के हाथों में ‘डेथ टू अमेरिका’ और ट्रंप को मारने के पोस्टर भी देखे गए. ईरान के खुफिया मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि अमेरिका-इजरायल के हमलों में मारे गए खामेनेई और अन्य लोगों की मौत का बदला लिया जाएगा. मंत्रालय ने यह भी कहा कि जब तक हत्या के जिम्मेदार लोगों से बदला नहीं लिया जाता, उनके जख्म नहीं भरेंगे. इस बयान से साफ है कि ईरान में बदले की आग भड़क चुकी है और लोग अपने नेता की मौत का बदला लेना चाहते हैं.

अली खामेनेई की आखिरी मंजिल क्यों है मशहद?

यह सवाल कई लोगों के मन में उठ रहा है कि आखिर अली खामेनेई को मशहद में ही क्यों दफनाया जा रहा है? इसके पीछे धार्मिक और ऐतिहासिक कारण हैं. शिया इस्लाम के 12 पवित्र इमामों में से सिर्फ इमाम रजा ईरान में दफन हैं. बाकी सभी इमाम सऊदी अरब या इराक में दफन हैं. इमाम रजा को शिया इस्लाम का आठवां इमाम माना जाता है. अब्बासी खलीफा ने कथित तौर पर उन्हें जहर देकर मारा था. जिस स्थान पर इमाम रजा को दफनाया गया, वहीं आगे चलकर ‘मशहद’ कहलाया. तेहरान के बाद मशहद ईरान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है. शियाओं के लिए मशहद मक्का, मदीना और कर्बला के बाद सबसे पवित्र स्थलों में से एक है. हर साल दुनिया भर से लाखों शिया श्रद्धालु यहां जियारत के लिए पहुंचते हैं. यही कारण है कि खामेनेई की अंतिम विदाई के लिए इस पवित्र शहर को चुना गया.

10 facts about Khamenei burial in Mashhad (AI)

अमेरिका में जश्न: 250 सालों का सफर

वहीं अमेरिका ने 4 जुलाई 2026 को अपनी आजादी के 250 साल पूरे किए. इस मौके पर देशभर में भव्य समारोह आयोजित किए गए. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अवसर पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कम्युनिज्म और अमेरिकी विरोधी विचारधाराओं पर जोरदार हमला बोला. उन्होंने कहा कि अमेरिकी सैनिकों ने दुनिया भर में कम्युनिज्म के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और यह विचारधारा कभी अमेरिका में जगह नहीं बना सकती.

लेकिन इस जश्न की एक और परत है, जो कम चर्चित है. ट्रंप प्रशासन इस जश्न को ईरान से मिली ‘जीत’ से जोड़कर देख रहा है. अमेरिका को लगता है कि उसने ईरान को काबू कर लिया है और इसी कारण इस जश्न को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. लेकिन क्या वाकई यह जीत है? अमेरिका ने इस जंग में अपने 55 विमान खो दिए, कई लाख करोड़ रुपये खर्च किए, 16 जवान शहीद हुए और लगभग 400 सैनिक घायल होकर अस्पतालों में भर्ती हैं. फिर भी ट्रंप को लगता है कि वह जंग जीत गए हैं. यह बात समझ से परे है कि जिस जंग में अमेरिका की वैश्विक बदनामी हुई, उसके हथियारों पर दुनिया का भरोसा कम हुआ, उसे वह जीत कैसे कह सकता है?

Facts on 250th anniversary of America's independence (AI)

 ट्रंप का विवादित बयान: एक झटके में खत्म कर सकते हैं सबको?

डोनाल्ड ट्रंप ने अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को लेकर एक बड़ा और विवादित बयान दिया है. उन्होंने कहा कि ईरान के सभी बड़े नेता एक जगह इकट्ठे हैं और यह ऐसा वक्त है, जब अमेरिका चाहे तो एक ही वार में सबको खत्म कर सकता है. ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा- ‘वे सब वहां हैं... एक गोली चला दी जाए तो सबको खत्म किया जा सकता है.’ हालांकि, इसके तुरंत बाद उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ऐसा नहीं करेगा, क्योंकि फिर बातचीत करने के लिए कोई नहीं बचेगा.

ट्रंप के इस बयान ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. एक ओर जहां ईरान में अपने नेता के अंतिम संस्कार में लोग मातम मना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसी टिप्पणी कर रहे हैं, जो वैश्विक शांति के लिए खतरनाक हो सकती है. इस बयान ने एक बार फिर अमेरिका की सैन्य मानसिकता को उजागर किया है. ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिका ने खामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए ईरान को एक हफ्ते की छुट्टी दी है और कार्यक्रम खत्म होने के बाद ईरान को अमेरिकी शर्तें माननी होंगी.

इतिहास के 5 सबसे बड़े अंतिम संस्कार

अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में जुटी भीड़ इतिहास के कुछ सबसे बड़े अंतिम संस्कारों में शुमार होगी. आइए नजर डालते हैं उन पांच बड़े अंतिम संस्कारों पर, जिनमें भारी जनसैलाब उमड़ा था:

1. सी. एन. अन्नादुरई (1969): तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरई की अंतिम यात्रा इतिहास की सबसे बड़ी अंतिम यात्रा मानी जाती है. उनके अंतिम संस्कार में करीब 1.5 करोड़ लोग शामिल हुए थे. जनसैलाब के कारण उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ.

2. अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी (1989): ईरान के इस्लामिक गणराज्य के संस्थापक अयातुल्ला खुमैनी के निधन पर लाखों लोग जुटे थे. उनकी अंतिम यात्रा में करीब 1 करोड़ लोग शामिल हुए थे, जो उस समय ईरान की कुल आबादी के लगभग छठे हिस्से के बराबर थी.

3. गमाल अब्देल नासिर (1970): मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर अरब दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते थे. उनके अंतिम संस्कार में 50 लाख से अधिक लोग पहुंचे थे. काहिरा की सड़कों पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था.

4. पोप जॉन पॉल द्वितीय (2005): पोप जॉन पॉल द्वितीय के निधन पर दुनियाभर से श्रद्धांजलि देने लोग रोम पहुंचे. उनके अंतिम संस्कार में करीब 40 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी. समारोह में 4 राजा, 5 रानियां और 70 से अधिक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शामिल हुए थे.

5. उम्म कुलसूम: अरब जगत की मशहूर गायिका उम्म कुलसूम के निधन पर काहिरा में अभूतपूर्व भीड़ उमड़ी. उनकी अंतिम यात्रा में करीब 40 लाख लोग शामिल हुए थे. लोगों ने उनके ताबूत को अपने कंधों पर उठाकर करीब 3 घंटे तक पूरे शहर में घुमाया था.

 अमेरिका के 250 साल: जंगों का इतिहास

अमेरिका आज 250 साल की अपनी यात्रा का जश्न मना रहा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन 250 सालों में अमेरिका ने कितनी जंगें लड़ी हैं? यह आंकड़ा चौंकाने वाला है. अमेरिकी कांग्रेस की शोध संस्था, Congressional Research Service (CRS) के अनुसार, 1798 के बाद से अमेरिका ने विदेशों में करीब 469 बार सैन्य दखल दिया है. इनमें से 36 को बड़े युद्ध माना जाता है, लेकिन संविधान के मुताबिक कांग्रेस ने इनमें से सिर्फ 5 युद्धों की औपचारिक घोषणा की.

सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि 249 सालों में से करीब 229 साल यानी अस्तित्व के लगभग 92% समय अमेरिका किसी न किसी युद्ध या सशस्त्र संघर्ष में उलझा रहा. 1776 से 1945 तक यानी पहले 170 सालों में अमेरिका ने करीब 90 सैन्य दखल दिए, लेकिन उसके बाद के सिर्फ 80 सालों में यह आंकड़ा 300 से ऊपर चला गया. कुल 469 दखलों में से आधे से ज्यादा, यानी 251, सिर्फ 1991 के बाद हुए हैं.

1945 के बाद अमेरिका ने युद्ध की औपचारिक घोषणा करना बंद कर दिया. इसके तीन मुख्य कारण हैं: पहला, संयुक्त राष्ट्र चार्टर जिसके तहत किसी देश पर सीधे युद्ध की घोषणा करना गैर-कानूनी हो गया; दूसरा, घरेलू राजनीति के कारण युद्ध घोषित करने से कड़े कानूनी प्रतिबंध लग जाते हैं; और तीसरा, अमेरिकी संसद अब ऑथराइजेशन फॉर यूज ऑफ मिलिट्री फोर्स (AUMF) पास कर देती है, जिससे राष्ट्रपति को बिना युद्ध घोषित किए सेना भेजने की शक्ति मिल जाती है.


 अमेरिका के प्रमुख युद्ध और उनके नतीजे

- अमेरिकी क्रांतिकारी युद्ध (1775–1783): ब्रिटेन के खिलाफ यह युद्ध अमेरिका ने जीता और स्वतंत्रता हासिल की.
- प्रथम विश्व युद्ध (1917–1918): मित्र राष्ट्रों के साथ मिलकर अमेरिका ने जीत दर्ज की.
- द्वितीय विश्व युद्ध (1941–1945): जर्मनी, जापान, इटली के खिलाफ अमेरिका की निर्णायक जीत हुई.
- कोरियाई युद्ध (1950–1953): यह युद्ध बिना किसी स्पष्ट जीत या हार के युद्धविराम के साथ समाप्त हुआ.
- वियतनाम युद्ध (1955–1975): अमेरिका को एक लंबे और घातक संघर्ष के बाद पीछे हटना पड़ा.
- शीत युद्ध (1947–1991): सोवियत संघ के विघटन के साथ अमेरिका विजेता बनकर उभरा.
- इराक (2003): सद्दाम हुसैन की सरकार तो गिर गई, लेकिन अमेरिकी जीत नहीं मिली.

 सबसे लंबी अमेरिकी लड़ाइयां

- अफगानिस्तान: 20 साल
- वियतनाम: 20 साल
- कोरिया: 3 साल
- द्वितीय विश्व युद्ध: 4 साल (US की भागीदारी)
- प्रथम विश्व युद्ध: 19 महीने

 अमेरिकी वैश्विक दबदबा: चुनौती के दौर में?

अमेरिका आज एक अहम मोड़ पर खड़ा है. वह दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक ताकत तो है, लेकिन कई सवाल उसके सामने खड़े हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आज भी अमेरिका पहले जैसे मजबूत है या समय के साथ कमजोर पड़ गया है? सिर्फ जंग ही नहीं, अमेरिका ने दूसरे देशों के लोकतांत्रिक चुनावों में भी बड़े पैमाने पर दखल दिया है. एक रिपोर्ट के अनुसार, 1946 से 2000 के बीच अमेरिका ने 81 विदेशी चुनावों में हस्तक्षेप किया, जिनमें ज्यादातर गुप्त तरीकों का इस्तेमाल हुआ.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका इस समय घरेलू राजनीति में गहरे मतभेदों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चुनौतियों का सामना कर रहा है. हाल में अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्ष और उसके बाद बने हालात ने अमेरिका की वैश्विक छवि को नई चुनौती दी है. दूसरी ओर चीन लगातार अपनी ताकत बढ़ा रहा है और भारत समेत कई देश अपनी विदेश और सुरक्षा नीति में बदलाव कर रहे हैं.

ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में भी गिरावट दर्ज की गई है. दुनिया अब यह देखने का इंतजार कर रही है कि ट्रंप के बाकी बचे ढाई साल के कार्यकाल में अमेरिका खुद को संभालता है, या महाशक्ति के पतन का एक नया अध्याय लिखता है.

Story By: Dileep Mishra