US-ईरान शांति समझौता टूटने के कगार पर! 300 बिलियन डॉलर पैकेज पर ट्रंप का साफ इंकार

अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से चल रहे तनाव के बाद शांति समझौता लगभग तय हो गया था. लेकिन अब एक नया बड़ा विवाद सामने आ गया है, जिसकी वजह से पूरा शांति प्रक्रिया खतरे में पड़ गया है.

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Shilpa Srivastava

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से चल रहे तनाव के बाद शांति समझौता लगभग तय हो गया था. लेकिन अब एक नया बड़ा विवाद सामने आ गया है, जिसकी वजह से पूरा शांति प्रक्रिया खतरे में पड़ गया है. विवाद की वजह है 300 बिलियन डॉलर (करीब 25 लाख करोड़ रुपये) का पुनर्निर्माण पैकेज. ईरान का कहना है कि यह पैकेज समझौते का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है. ईरान इसे युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई मानता है.

तेहरान के मुताबिक, बिना आर्थिक मदद के स्थायी शांति नहीं टिक सकती, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ इनकार कर दिया है. ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर पोस्ट लिखा, “ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने का वादा किया है. लेकिन अमेरिका ईरान को 300 बिलियन डॉलर देने वाली खबर पूरी तरह फेक न्यूज है.” ट्रंप ने इसे डेमोक्रेट्स की साजिश बताया है.


दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी असहमति:

यह दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी असहमति बन गई है. ईरान इसे युद्ध क्षति के लिए मुआवजा मान रहा है, जबकि अमेरिका इसे निवेश और पुनर्निर्माण कार्यक्रम के रूप में पेश करना चाहता है. अमेरिका का कहना है कि वह सीधे पैसे नहीं देगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और प्राइवेट कंपनियों के जरिए ईरान की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद करेगा.

ईरान चाहता है ठोस गारंटी:

ट्रंप के सलाहकारों का मानना है कि बड़े-बड़े निवेश और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट से ही इलाके में स्थिरता आएगी, लेकिन ईरान ठोस गारंटी चाहता है. देखा जाए तो यह विवाद सिर्फ पैसे का नहीं है. यह दोनों देशों की बातचीत की नीयत, भरोसे और राजनीति का सवाल बन गया है. ईरान के लिए यह पैकेज अपनी जीत और सम्मान का प्रतीक है. वहीं अमेरिका के लिए इतनी बड़ी राशि देना राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है.

अगर दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े रहे तो 19 जून को प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर मुश्किल हो सकते हैं. शांति समझौते अक्सर इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि दोनों पक्ष अलग-अलग उम्मीदें रखते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह मुद्दा सुलझ गया तो मध्य पूर्व में स्थिरता आ सकती है, तेल की कीमतें स्थिर होंगी और विश्व अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी. लेकिन फिलहाल स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है. पूरी दुनिया इस विवाद पर नजर रखे हुए है.