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ऋषि सुनक बने 'बलि का बकरा,' यूं ही नहीं जीते हैं कीर स्टार्मर, गिन लीजिए कंजर्वेटिव पार्टी की कमियां

UK General Election 2024: भारत में पीएम नरेंद्र मोदी ने नारा दिया था अबकी बार 400 पार. ये नारा भारत में तो नहीं साकार हुआ लेकिन ब्रिटेन में हो गया. लेबर पार्टी ने 400 से ज्यादा सीटें हासिल की हैं. ब्रिटेन के होने वाले प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा है कि अब उनका देश नए बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार है.

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UK General Election 2024: कीर स्टार्मर अब ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री होंगे. उनके नेतृत्व में लेबर पार्टी ने ऐसा प्रदर्शन किया है, जिसकी उम्मीद नहीं थी. उन्होंने कंजर्वेटिव पार्टी को बुरी हार दी है. ऋषि सुनक अब सत्ता से बहुत दूर हो गए हैं, हालांकि वे अपनी सीट बचाने में कामयाब हो गए हैं. लेबर पार्टी को प्रचंड बहुमत मिलता नजर आ रहा है. लेबर पार्टी करीब 14 साल से वनवास झेल रही थी. 14 साल से लगातार जोड़-तोड़ करके कंजर्वेटिव पार्टी सत्ता में बनी हुई थी. साल 2019 में बोरिस जॉनसन के नेतृत्व में कंजर्वेटिव पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला. बहुमत के बाद भी 2 प्रधानमंत्री बदले. लिज ट्रेस और ऋषि सुनक. चुनाव के आते-आते सत्ता की सारी धुरी ऋषि सुनक के इर्द-गिर्द घूमने लगी. उन्होंने बेहद मुश्किल में देश संभाला लेकिन उनकी करारी हार हुई. ऋषि सुनक बलि का बकरा बने थे. दरअसल वजह ये थी कि उनकी पार्टी के खिलाफ हद से ज्यादा एंटी इनंकबेंसी थी, जिसकी वजह से लेबर पार्टी प्रंचड बहुमत से जीती.

ऋषि सुनक ने अपनी हार स्वीकार कर ली है. लेबर पार्टी को आम चुनावों में जीत मिली तो उन्होंने कीर स्टार्मर को बधाई देते हुए कहा कि मुझे हार स्वीकार है. ऋषि सुनक खुद नॉर्दन इंग्लैंड से चुनाव लड़े थे. लेबर पार्टी की ऐसी अप्रत्याशित जीत कैसे हुई, इस पर वैश्विक मामलों पर रखने वाले अलग-अलग विद्वानों का कहना है कि यूके में अब बदलाव की जरूरत है. आइए जानते हैं कौन सी वे वजहें रहीं, जिनके चलते ऋषि सुनक अपनी सरकरा गंवा बैठे. 

क्यों हारे ऋषि सुनक, गिन लीजिए वजहें 

- ऋषि सुनक, एंटी इनकंबेंसी की वजह से हारे हैं. ब्रिटेन में ऐसा कभी हुआ नहीं है कि 15 साल तक कोई सरकार, बिना हारे हुई चली हो. किसी भी ब्रिटिश पार्टी के नाम ये रिकॉर्ड नहीं दर्ज है. ब्रिटेन में हर 10 से 15 साल पर सत्ता बदल जाती है. यही ब्रिटिश परंपरा रही है. 

- टोरीज ने साल 1979 से लेकर 1997 तक शासन संभाला. लेबर 1997 से लेकर 2010 तक सत्ता में काबिज रहे. फिर टोरीज आए. ब्रिटिश वोटर्स एक बार फिर बदलाव के लिए तैयार दिखे. 

- टोरीज के आर्थिक सुधार हमेशा संदेह के घेरे में रहे. जनता पर लगातार टैक्स का अतिरिक्त बोझ बढ़ता रहा और बड़ी संख्या में प्रवासन होता रहा.  निजेल फराज एक नई पार्टी लेकर आए जिसा नाम रिफॉर्म यूके है. ये वही हैं, जिनकी वजह से ब्रेग्जिट हुआ. निजेल की पार्टी और ऋषि सुनक की पार्टी, दोनों की नीतियां लगभग एक जैसी ही रहीं. निजेल ने ऋषि सुनक का वोट काटा.

- ज्यादातर सुधारवादी आंकडे़ इस ओर इशारा कर रहे थे कि ऋषि सुनक की सरकरा गिरने वाली है. 

टोरीज की गलतियों ने डुबोया ऋषि सुनक का करियर

- कंजर्वेटिव सपोर्टर्स लगातार हो रहे स्कैंडल्स से परेशान थे. साल 2010 से ही इस पार्टी के सितारे डगमगाने लगे. दुनिया जब कोविड से मर रही थी, तब बोरिस जॉनसन ने धमाकेदार पार्टी की थी. लिज ट्रस की वजह से बुरी तरह से अर्थव्यवस्था डूब गई थी. उन्होंने टैक्स रिफॉर्म के नाम पर अनफेंडेट टैक्स कट को बढ़ावा दिया था, जिसकी वजह से वोटर भड़क गए.  

- ऋषि सुनक ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की लेकिन उनसे हो नहीं पाया. हाल ही में एक टीवी डिबेट में उनसे महिला सवाल कर बैठी कि कैसे राजा से भी ज्यादा धनी प्रधानमंत्री हमारी जरूरतों को समझ सकता है. ऋषि सुनक ने जवाब में कहा, 'जब उनके पालन-पोषण की बात आती है तो मैं सबसे पहले उनकी मदद करता हूं.'

कैसे ब्रिटेन में छा गई लेबर पार्टी?

कीर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने जनता का मिजाज बदल दिया. उनके पास, सत्तारूढ़ सरकार से ज्यादा बेहतर आर्थिक सुधार के विकल्प थे. ब्रिटेन की गरीबी उनके लिए मुद्दा नहीं थी, वहां की स्टैंडर्डर ऑफ लिविंग मुद्दा है. ब्रिटेन में रहन-सहन का खर्च संकट, पब्लिक सर्विस और नैतिकता को लेकर लेबर पार्टी ने चुनाव लड़ा. स्टार्मर की पार्टी ने जेरेमी कॉर्बिन के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ा दी. यहूदियों के खिलाफ मूवमेंट को खारिज किया. 

ब्रिटेन के 7 दशकों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह लोक कल्याणकारी योजनाएं बना सके. ब्रिटेन ने अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए  29 लाख करोड़ रुपए खर्च किए. ऋषि सुनक ने फैसला किया कि कर्ज लेकर आर्थिक सुधार करते हैं. विश्व बैंक से उन्होंने कर्ज लिया, ब्याज की दर रही 0.1 प्रतिशत, कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि कर्ज का बोझ और बढ़ता गया. लेबर पार्टी ने इन नीतियों के खिलाफ ही हल्ला-बोल किया. जनता ने भी लेबर पार्टी का साथ दे दिया.