अजरबैजान में मिले 3500 साल पुराने स्वास्तिक के निशान, क्या है भारत से इसका ऐतिहासिक संबंध?

मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान के कई पुरातात्विक स्थलों से स्वास्तिक जैसे प्राचीन प्रतीक मिले हैं. 3500 साल पुराने अनुष्ठानिक घड़े से लेकर आतिशगाह मंदिर, ऐतिहासिक इमारतों और पारंपरिक कालीनों तक यह प्रतीक दिखाई देता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह खोज प्राचीन यूरेशिया की साझा सांस्कृतिक परंपराओं की ओर संकेत करती है.

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Shanu Sharma

अगर किसी मुस्लिम बहुल देश में स्वास्तिक जैसे प्राचीन प्रतीक मिलें तो यह स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा पैदा करता है. अजरबैजान के कई पुरातात्विक स्थलों से मिली कलाकृतियां इसी तरह का इतिहास सामने लाती हैं.

इनमें सबसे चर्चित खोज शमकीर जिले के गराज अमीरली पुरातात्विक टीले से मिला करीब 3500 साल पुराना अनुष्ठानिक मिट्टी का घड़ा है, जो आज अजरबैजान के राष्ट्रीय इतिहास संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है. इसे मध्य कांस्य युग का माना जाता है. काले रंग के इस घड़े पर स्वास्तिक के साथ सूर्य चक्र, हिरण के सींग, सर्पिल रेखाएं और अन्य ज्यामितीय आकृतियां बनी हुई हैं. 

कई पुरातात्विक स्थलों पर मिले समान चिन्ह

संग्रहालय के अनुसार उस समय स्वास्तिक को सूर्य, चक्र को अनंत काल, हिरण के सींग को शक्ति और सर्पिल रेखाओं को अमरता का प्रतीक माना जाता था. माना जाता है कि इस घड़े का उपयोग धार्मिक और अनुष्ठानिक कार्यों में किया जाता था. गराज अमीरली के अलावा गेदाबेक, नखचिवन और खोदजली-गेदाबेक संस्कृति से जुड़े कई स्थलों से कांस्य युग के बर्तन, लटकन, कांस्य बेल्ट और अन्य वस्तुएं मिली हैं.


इन पर चार मुड़ी हुई भुजाओं वाले स्वास्तिक जैसे रूपांकन दिखाई देते हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार ये चिन्ह सूर्य, समय के चक्र, ब्रह्मांड और सुरक्षा से जुड़े सांस्कृतिक विश्वासों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इससे संकेत मिलता है कि प्राचीन यूरेशिया की विभिन्न सभ्यताओं में ऐसे प्रतीकों का व्यापक उपयोग होता था.

भारत और अजरबैजान के सांस्कृतिक संबंध

बाकू के सुरखानी क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक आतिशगाह मंदिर भारत और अजरबैजान के सांस्कृतिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है. मंदिर की दीवारों पर संस्कृत और गुरुमुखी भाषा के करीब 20 शिलालेख मौजूद हैं. कई अभिलेखों के ऊपर स्वास्तिक और सूर्य के चिन्ह भी बने हुए हैं. इनमें भगवान शिव और भगवान गणेश को समर्पित लेख भी शामिल हैं.

इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर भारतीय व्यापारियों और श्रद्धालुओं के आगमन का साक्ष्य है. अजरबैजान की मध्यकालीन इस्लामी वास्तुकला में भी स्वास्तिक जैसी सममित ज्यामितीय आकृतियां देखने को मिलती हैं. नखचिवन के मोमिने खातून मकबरे और यूसुफ इब्न कुसेइर मकबरे सहित कई ऐतिहासिक इमारतों की ईंटों और टाइलों पर ऐसे डिजाइन बनाए गए हैं. वहीं काजाक, शिर्वन और काराबाख शैली के पारंपरिक कालीनों में भी ऐसे रूपांकन मिलते हैं, जिन्हें स्थानीय परंपरा में सूर्य, समृद्धि, सुरक्षा और जीवन चक्र का प्रतीक माना जाता है.

क्या भारत से जुड़ा है इसका सीधा संबंध?

इतिहासकारों का कहना है कि स्वास्तिक दुनिया के सबसे प्राचीन शुभ प्रतीकों में से एक है. भारत में यह हजारों वर्षों से शुभता, समृद्धि और जीवन चक्र का प्रतीक माना जाता है. वहीं अजरबैजान में मिले ऐसे पुरातात्विक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि प्राचीन यूरेशिया की अनेक सभ्यताओं में भी इस प्रकार के प्रतीकों का प्रयोग होता था. हालांकि अब तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है जो यह साबित करे कि यह प्रतीक सीधे भारत से अजरबैजान पहुंचे थे. विशेषज्ञों के अनुसार इन्हें प्राचीन व्यापारिक मार्गों, सांस्कृतिक संपर्कों और समान प्रतीक परंपराओं के व्यापक संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा.