ईरान संकट से हुई अमेरिका की चांदी? रूस की तेल दिग्गज कंपनी के CEO ने खोले बड़े राज

रूसी तेल प्रमुख इगोर सेचिन के अनुसार ईरान संकट और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़े तनाव का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों को मिला है. तेल की कीमतें बढ़ने से उनका निर्यात मुनाफा काफी बढ़ गया है.

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Kuldeep Sharma

नई दिल्ली: रूस की दिग्गज तेल कंपनी 'रोसनेफ्ट' के प्रमुख इगोर सेचिन ने दावा किया है कि ईरान और हॉरमुज जलडमरूमध्य के बीच बढ़े तनाव का सबसे ज्यादा फायदा अमेरिकी एनर्जी कंपनियों को मिला है. सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में बोलते हुए सेचिन ने कहा कि इस संकट की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल मची और तेल की कीमतें आसमान पर पहुंच गईं जिसने अमेरिकी उत्पादकों के लिए बंपर कमाई के रास्ते खोल दिए.

ईरान पर अमेरिकी कार्रवाई का पूरी दुनिया पर असर

सेचिन का मानना है कि ईरान के खिलाफ की गई कार्रवाइयों का असर सिर्फ उस इलाके तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ा. उन्होंने तर्क दिया कि इस विवाद से पैदा हुई अस्थिरता को कम करके आंका गया जबकि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है. उनके मुताबिक तेल के दाम बढ़ने से अमेरिकी कंपनियों को अपने एक्सपोर्ट की ऊंची कीमत मिली जिससे उनका मुनाफा काफी बढ़ गया.

इस तरह अमेरीका ने अपनी पकड़ की मजबूत

गौरतलब है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है जहां से वैश्विक तेल सप्लाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजरता है. ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के बाद इस रूट पर सप्लाई रुकने का डर पैदा हो गया था जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में घबराहट फैल गई थी. सेचिन ने कहा कि इसी डर और महंगी ऊर्जा का फायदा उठाकर अमेरिकी कंपनियों ने बाजार में अपनी पकड़ मजबूत कर ली जबकि बाकी देशों को महंगे तेल और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा.

रोसनेफ्ट प्रमुख ने यह चेतावनी भी दी कि अगर यह भू-राजनीतिक तनाव इसी तरह जारी रहा तो मलक्का, बाब अल-मंडेब और जिब्राल्टर जैसे अन्य महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते भी खतरे में पड़ सकते हैं. इनमें से किसी भी रूट पर रुकावट आने से वैश्विक व्यापार और तेल की सप्लाई ठप हो सकती है.

ओपेक प्लस के भविष्य पर भी सवाल

इसके अलावा सेचिन ने कच्चे तेल उत्पादक देशों के संगठन 'ओपेक प्लस' के भविष्य पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में कुछ देशों के इस ग्रुप से बाहर निकलने के कारण बाजार पर इसका दबदबा कम हुआ है. वहीं रूस के तेल क्षेत्र पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि देश में घटते तेल उत्पादन को संभालने के लिए अगले कुछ सालों में करीब 10 लाख करोड़ रूबल के भारी निवेश की जरूरत होगी.