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ईरान का नया टारगेट 'डिसेलिनेशन प्लांट', खाड़ी देशों के 400 वाटर प्लांट्स पर मंडराया संकट; बूंद-बूंद पानी के लिए मचेगा हाहाकार!

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध अब तेल से पानी की ओर मुड़ गया है. डिसेलिनेशन प्लांट पर बढ़ते हमलों ने खाड़ी देशों में भीषण जल संकट का खतरा पैदा कर दिया है. रियाद और दुबई जैसे शहर प्यासे रह सकते हैं.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब केवल तेल की वैश्विक आपूर्ति तक सीमित नहीं रहा. विशेषज्ञों का मानना है कि यह महायुद्ध अब पानी के लिए जंग में तब्दील हो सकता है. खाड़ी के रेगिस्तानी देशों के लिए तेल से अधिक मूल्यवान समुद्र का वह खारा पानी है, जिसे डिसेलिनेशन तकनीक से पीने योग्य बनाया जाता है. हाल ही में ईरान और बहरीन के वाटर प्लांट्स पर हुए हमलों ने इस खतरे को हकीकत में बदल दिया है.

खाड़ी देशों के लिए समंदर का पानी ही जीवन का आधार है. यहां तेल तो प्रचुर मात्रा में है, लेकिन शुद्ध पेयजल के लिए ये देश पूरी तरह डिसेलिनेशन प्लांट पर निर्भर हैं. दुनिया की कुल डिसेलिनेशन क्षमता का 60 प्रतिशत हिस्सा अकेले खाड़ी देशों के पास है. फारस की खाड़ी में 400 से अधिक ऐसे प्लांट हैं, जो करोड़ों लोगों की प्यास बुझाते हैं. इन बुनियादी ढांचों पर हमला होने का मतलब है करोड़ों लोगों का बूंद-बूंद पानी को तरसना.

हमलों का सिलसिला और डर 

खतरा तब बढ़ गया जब होर्मुज स्ट्रेट के पास ईरान के केशम द्वीप पर स्थित वाटर प्लांट को निशाना बनाया गया. जवाब में ईरान ने बहरीन के डिसेलिनेशन प्लांट पर ड्रोन से हमला बोला. यह घटना दर्शाती है कि अब सैन्य ठिकानों और तेल कुओं के बाद वाटर प्लांट दुश्मन के निशाने पर हैं. सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे देशों के वाटर प्लांट पर हमले की आशंका ने पूरे क्षेत्र में भारी हड़कंप मचा दिया है.

विद्रोही गुट और तकनीकी खतरा 

इन विशाल प्लांट्स की सुरक्षा करना एक बड़ी चुनौती है. ईरान समर्थित हुती विद्रोही पहले भी बुनियादी ढांचों पर ड्रोन हमले कर चुके हैं. मिसाइल या रॉकेट हमलों को रोकना अत्यंत कठिन है. इसके अलावा समुद्र में बिछी बारूदी सुरंगें पानी खींचने वाली पाइपलाइनों को तबाह कर सकती हैं. सबसे बड़ा खतरा साइबर हमले का है, क्योंकि ये आधुनिक प्लांट कंप्यूटर आधारित 'स्काडा सिस्टम' पर चलते हैं, जिसे हैक कर पानी का रासायनिक संतुलन बिगाड़ा जा सकता है.

कुछ ही घंटों में मचेगा हाहाकार 

खाड़ी देशों में पानी का रणनीतिक भंडारण बहुत सीमित है. कतर, कुवैत और यूएई जैसे देशों के पास केवल कुछ ही दिनों का बैकअप होता है. यदि प्लांट रुकते हैं, तो महानगरों में हाहाकार मचने में देर नहीं लगेगी. रियाद, दुबई और अबू धाबी जैसे आधुनिक शहरों में बिना पानी के जीवन की कल्पना करना असंभव है. हमले के कुछ ही घंटों बाद जल आपूर्ति ठप हो जाएगी, जिससे मानवीय संकट और विस्थापन की स्थिति पैदा हो सकती है.

बिजली और पानी का दोहरा संकट 

मध्य पूर्व के कई वाटर प्लांट केवल पानी ही नहीं, बल्कि बिजली का उत्पादन भी करते हैं. ऐसे में इन ठिकानों पर हमला होने से दोहरी मार पड़ेगी. पानी की किल्लत के साथ-साथ शहरों की बत्तियां भी गुल हो जाएंगी. यह स्थिति युद्ध को एक बेहद डरावने मोड़ पर ले जा सकती है, जहां पूरी आबादी न केवल अंधेरे में होगी, बल्कि बुनियादी जीवन रक्षक संसाधनों के लिए तरस जाएगी. यह युद्ध अब मानवता के अस्तित्व की लड़ाई बनता जा रहा है.