होर्मुज पर ईरान का बड़ा दांव, 2029 तक ट्रंप से समझौता नहीं! अमेरिका के सामने बढ़ी चुनौती

ईरान ने अमेरिका के साथ तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर रुख सख्त किया है. तेहरान ने 2029 तक ट्रंप प्रशासन से समझौता नहीं करने और तीन प्रमुख शर्तें दोहराने के संकेत दिए हैं.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है. ईरानी पक्ष से जुड़े एक बयान में कहा गया है कि तेहरान मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के साथ समझौते की जल्दबाजी नहीं करेगा. उसने 20 जनवरी 2029 तक इंतजार करने की बात कही है. साथ ही होर्मुज को लेकर अपनी मांगें दोहराई हैं. इस रुख से ऊर्जा आपूर्ति, तेल बाजार और पश्चिम एशिया की कूटनीति पर दबाव बढ़ने की आशंका है.

ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ के वरिष्ठ सलाहकार माजिद शाकेरी ने सोशल मीडिया पोस्ट में अमेरिका के साथ बातचीत को लेकर तेहरान की रणनीति बताई. उनके अनुसार, ईरान मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान किसी समझौते के लिए जल्दबाजी नहीं करेगा. उन्होंने 20 जनवरी 2029 तक इंतजार करने की बात कही. उनके बयान में ‘न युद्ध, न शांति’ वाली स्थिति को रणनीतिक धैर्य के साथ आगे बढ़ाने का संकेत दिया गया.

बातचीत से ज्यादा दबाव की रणनीति

शाकेरी के मुताबिक, ईरान के लिए तत्काल समझौते या सीधे टकराव के बजाय अनिश्चितता बनाए रखना बेहतर रणनीति है. उन्होंने अमेरिका के साथ किसी बातचीत की सार्वजनिक पुष्टि को भी उचित नहीं बताया. इस रुख से संकेत मिलता है कि तेहरान फिलहाल अमेरिकी दबाव के बीच अपनी स्थिति मजबूत रखने की कोशिश कर रहा है. ईरान की रणनीति में समय को भी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक हथियार के तौर पर देखा जा रहा है.


होर्मुज खोलने के लिए तीन मांगें

ईरानी पक्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अपनी मांगें फिर सामने रखी हैं. इनमें अमेरिकी प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाइयों से हुए नुकसान के बदले 300 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग शामिल है. इसके अलावा तेहरान अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों से जुड़ी शर्तों पर भी जोर देता रहा है. होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है, इसलिए इससे जुड़ा कोई भी फैसला अंतरराष्ट्रीय बाजार पर सीधा असर डाल सकता है.

तेल बाजार पर बढ़ सकता है दबाव

होर्मुज के रास्ते से दुनिया के कुल कच्चे तेल कारोबार का करीब पांचवां हिस्सा गुजरता है. सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और कतर जैसे ऊर्जा उत्पादक देश इस मार्ग का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में लंबे समय तक आवाजाही प्रभावित होने पर तेल और गैस की कीमतों में तेजी आ सकती है. इसका असर परिवहन लागत से लेकर कई देशों की महंगाई तक दिखाई दे सकता है.

‘न युद्ध, न शांति’ पर ईरान का जोर

ईरान के रुख को ‘रणनीतिक धैर्य’ की नीति के तौर पर देखा जा रहा है. तेहरान एक तरफ अमेरिका से सीधे युद्ध से बचना चाहता है, वहीं दूसरी ओर दबाव में समझौता करने के पक्ष में भी नहीं दिख रहा. 2029 तक इंतजार की बात इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है. हालांकि होर्मुज को लेकर अंतिम फैसला क्या होगा, यह आने वाले महीनों में क्षेत्रीय घटनाक्रम और अमेरिका-ईरान संबंधों पर निर्भर करेगा.