Bigg Boss 20

मक्का के पास हूती ड्रोन का खतरा, फिर क्यों पीछे हटा पाकिस्तान? नए ‘मक्का पैक्ट’ पर उठे सवाल

मक्का के पास संदिग्ध हूती ड्रोन गिराए जाने के बाद सऊदी अरब की सुरक्षा चिंता बढ़ गई है. इसी बीच नए मक्का रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान की सैन्य भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं.

social media
Kuldeep Sharma

नई दिल्ली: यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव तब और बढ़ गया जब मक्का के पास एक संदिग्ध ड्रोन देखा गया. सऊदी अरब की एयर डिफेंस प्रणाली ने इस ड्रोन को पवित्र शहर के प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने से पहले ही हवा में मार गिराया. इस घटना के बाद इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों की सुरक्षा और मध्य पूर्व के हालातों को लेकर चिंताएं फिर से गहरी हो गई हैं.

इस घटना ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में हुए सुरक्षा समझौते पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. इस समझौते के तहत यह बात कही गई थी कि तीनों में से किसी एक पर भी हमला हुआ, तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा. लेकिन जब सऊदी अरब पर हूती खतरा मंडराया, तो पाकिस्तान ने सीधे तौर पर अपनी सेना भेजने या किसी सैन्य कार्रवाई का ऐलान करने से साफ हाथ खींच लिए हैं.

क्या सच में मक्का को निशाना बनाया गया था?

सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलकी ने बताया कि मंगलवार शाम मक्का के दक्षिण में एक संदिग्ध ड्रोन देखा गया था. उनके मुताबिक, सऊदी वायु रक्षा बलों ने पवित्र शहर के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल होने से पहले ही उसे तबाह कर दिया.


अल-मलकी ने इसे आतंकी हरकत बताया और कहा कि दोनों पवित्र मस्जिदों और तीर्थयात्रियों की रक्षा करना सऊदी अरब की सबसे बड़ी प्राथमिकता है. उन्होंने साफ कहा कि देश किसी को भी पवित्र स्थलों की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं करने देगा. मक्का पर पहले भी ऐसे हमले की कोशिश हो चुकी है, जैसे 2017 में एक बैलिस्टिक मिसाइल दागी गई थी.

दूसरी ओर हूतियों ने सऊदी अरब के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है. हूती सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल यह्या सरी ने सऊदी दावों को झूठा बताया. उनका कहना है कि उनका संगठन किसी भी इस्लामिक पवित्र स्थल को निशाना नहीं बनाता, बल्कि उनके हमले सिर्फ सऊदी सैन्य ठिकानों और तेल प्रतिष्ठानों पर होते हैं.

सरी ने यह भी आरोप लगाया कि सऊदी अरब ने यमन में सैकड़ों हवाई हमले किए हैं. साथ ही उन्होंने दावा किया कि हूती बलों ने मारिब में सऊदी का एक F-15 फाइटर जेट भी गिरा दिया है, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है.

पाकिस्तान इस मामले से दूरी क्यों बना रहा है?

पाकिस्तान का रवैया इसलिए चर्चा में है क्योंकि उसने हाल ही में सऊदी अरब और तुर्की के साथ एक रक्षा समझौता किया था. समझौते के मुताबिक एक देश पर हमला बाकी सब पर हमला माना जाना था. इसके बावजूद इस्लामाबाद ने यमन के खिलाफ सैन्य अभियानों में सेना भेजने या सीधे तौर पर शामिल होने का कोई ऐलान नहीं किया है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि यमन के अंदर सैन्य कार्रवाई में शामिल होना अभी एक काल्पनिक स्थिति जैसी बात है. वहीं रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी कहा कि उन्हें यह पक्के तौर पर नहीं पता कि रियाद यानी सऊदी सरकार ने आधिकारिक तौर पर कोई सैन्य मदद मांगी भी है या नहीं.

पाकिस्तान के इस संभलकर चलने के पीछे कई बड़ी रणनीतिक वजहें हैं. एक तो यह कि पाकिस्तान के ईरान के साथ पुराने और अहम रिश्ते हैं, और ईरान ही हूती विद्रोहियों का समर्थन करता है. दूसरा, पाकिस्तान की ऊर्जा जरूरतें और खाड़ी देशों से आने वाला ईंधन उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी है. ऐसे में ईरान या हूतियों से सीधा पंगा लेना पाकिस्तान के लिए आर्थिक और अंदरूनी सुरक्षा के लिहाज से भारी पड़ सकता है.

यही वजह है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का के पास हुई घटना की कड़ी निंदा की और सऊदी सुरक्षा बलों की तारीफ जरूर की, लेकिन उन्होंने सीधे तौर पर अपनी सेना भेजने का कोई ऐलान नहीं किया.

सऊदी अरब और इजराइल: क्या कोई नया सुरक्षा रिश्ता बन रहा है?

पाकिस्तान के पीछे हटने से एक और दिलचस्प बात सामने आई है. ऐसा लग रहा है कि सऊदी अरब अब हूतियों की ताकत और उनकी हरकतों का पता लगाने के लिए खुफिया जानकारी की तलाश में है.

'द जेरूसलम पोस्ट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड की मध्यस्थता में सऊदी और इजरायली अधिकारियों के बीच बातचीत हुई है. यह बातचीत मुख्य रूप से हूतियों की गतिविधियों और संभावित खतरों से जुड़ी खुफिया जानकारी साझा करने पर आधारित थी.

फिलहाल सऊदी अरब और इजराइल के बीच औपचारिक तौर पर राजनीतिक रिश्ते नहीं हैं. सऊदी अरब साफ कह चुका है कि फिलिस्तीन के मुद्दे पर ठोस कदम उठाए जाने के बाद ही वह इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करेगा. लेकिन हूतियों के बढ़ते खतरे ने दोनों देशों के सुरक्षा हितों को एक मंच पर ला खड़ा किया है.

सऊदी अरब के लिए मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचने के लिए हूतियो की गतिविधियों की सटीक खुफिया जानकारी मिलना बहुत जरूरी है. भले ही इससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते बहाल न हुए हों, लेकिन सुरक्षा के मोर्चे पर यह एक बहुत बड़ा रणनीतिक बदलाव जरूर साबित हो सकता है.