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'ईरान हार न जाए तब तक हमला करते रहो', तेहरान के लिए बदल गए खाड़ी देशों के जज्बात; ट्रंप से UAE की विनती!

मिडिल ईस्ट युद्ध अब धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंच रहा है. खाड़ी देश जो पहले इसका विरोध कर रहे थे, वे भी अब अमेरिकी से ईरान के खिलाफ हमला करने की मांग कर रहे हैं. आइए जानते हैं किस देश की क्या राय है?

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Shanu Sharma

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच शुरू हुए जंग में खाड़ी देश पूरी तरह शामिल हो चुका है. अब मिल रही जानकारी के मुताबिक खाड़ी देशों की अगुवाई कर रहा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान के खिलाफ तेज हमले करने की अपील की है. 

खाड़ी देशों का मानना है कि एक महीने से चल रहे जंग के बाद भी ईरान की सैन्य और राजनीतिक शक्ति कमजोर नहीं हुई है. हालांकि जब इजरायल और अमेरिकी अचानक ईरान पर हमला किया था तब इन देशों ने नाराजगी जताई थी. उन्होंने कहा था कि इसके बारे में उन्हें पर्याप्त जानकारी और चेतावनी नहीं दिया गया. हालांकि अब स्थिति बदल गई है.

क्या है खाड़ी देशों की राय

सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और बहरीन के वरिष्ठ अधिकारियों ने निजी बैठक में स्पष्ट किया है कि अब वह इस अभियान को खत्म करना नहीं चाहते हैं. तब तक नहीं चाहते हैं जब तक ईरान के नेतृत्व में बड़ा बदलाव न आए या उसके व्यवहार में नाटकीय सुधार न हो. एक अधिकारी ने मीडिया से नाम ना बताने के शर्त पर कहा कि अगर अभी युद्ध रोक भी दिया जाता है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अरब पड़ोसियों को ईरान से कोई खतरा नहीं होगा.

कुल मिलाकर अब खाड़ी देश अमेरिकी नेतृत्व वाले इस सैन्य अभियान को अपना पूरा समर्थन दे रहे हैं. हालांकि इस युद्ध में उन्होंने खुद कोई कार्रवाई नहीं की है. इस जंग को लेकर अमेरिका दोहरी स्थिति में नजर आ रहा है. एक ओर समझौते की बात की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ ईरान को लगातार चेतावनी दी जा रही है. 

ईरान पर भड़का सऊदी अरब

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और बहरीन डटकर मुकाबला कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों से उन्हें पूरा समर्थन मिला हुआ है. उन्होंने कहा कि भले ही शुरुआत में कुछ देश इस सैन्य अभियान को लेकर हिचकिचा रहे थे लेकिन अब सबसे साथ हैं.

खाड़ी देशों में यूएई सबसे ज्यादा आक्रामक रुख अपनाए हुए है. ईरान की ओर अब तक यूएई पर 2300 से ज्यााद मिसाइलें और ड्रोने गिराने की कोशिश की गई. जिसके कारण वहां का आम जीवन काफी प्रभावित हुआ है. हालांकि कुछ खाड़ी देशोंका अब भी मानना है कि युद्ध को लंबा खींचने से अर्थव्यवस्था को भारी नकुसान पहुंच सकता है.