1975 में मुजीब की हत्या से लेकर 2024 में सैन्य शासन की वापसी तक, जानें बांग्लादेश में कैसा रहा है सेना का इतिहास

Role of the army in Bangladesh: बांग्लादेश की आजादी के महज 4 साल बाद ही उसके राष्ट्रपिता मुजीब की हत्या सेना द्वारा कर दी गई थी, जिसके बाद अगले 15 सालों तक सरकार में सेना ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगातार दखल दिया. ये दखल तब तक नहीं रुका जब तक बांग्लादेश की सत्ता में मुजीब की बेटी शेख हसीना की वापसी नहीं हुई, जिन्होंने साल 2008 में पहली बार सत्ता की कमान अपने हाथों में ली.

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Role of the army in Bangladesh: बांग्लादेश के इतिहास में सोमवार (5 अगस्त) का दिन कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ. जहां देश के लिए सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर काबिज रही पीएम शेख हसीना ने अपने पद से इस्तीफा देकर भारत में शरण ली तो वहीं पर एक लंबे अरसे के बाद बांग्लादेश में सैन्य शासन की वापसी हुई. मीडिया को संबोधित करते हुए बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकर-उज़-ज़मान ने कहा कि देश चलाने के लिए एक अंतरिम सैन्य सरकार बनाई जाएगी.

शेख हसीना को छोड़ना पड़ा देश

उन्होंने कहा कि वे "ज़िम्मेदारी ले रहे हैं", और लोगों से शांति और व्यवस्था बनाए रखने का आग्रह किया. सरकारी नौकरियों में स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए आरक्षण देने के विरोध में शुरू हुए प्रदर्शनों के हिंसक बन जाने के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना को न सिर्फ इस्तीफा देना पड़ा बल्कि देश छोड़कर भी भागना पड़ा. पीएम शेख हसीना के इस्तीफा देने के बाद हजारों लोग सड़कों पर जश्न मना रहे थे और कई लोग प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के आधिकारिक आवास पर धावा बोल रहे थे.

बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि टीवी पर दिखाई गई तस्वीरों में प्रदर्शनकारियों को स्वतंत्र बांग्लादेश के जनक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की एक विशाल प्रतिमा के सिर पर हमला करते हुए दिखाया गया. पाकिस्तान से देश की आजादी के सिर्फ चार साल बाद मुजीब की अगस्त 1975 में सेना द्वारा तख्तापलट में हत्या कर दी गई थी. इसके बाद सेना ने अगले 15 वर्षों तक बांग्लादेश की राजनीति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कंट्रोल किया. आइए एक नजर बांग्लादेश के इतिहास में सेना के रोल पर डालते हैं-

1971 का मुक्ति संग्राम

पाकिस्तान (तब पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान) के 1970 के आम चुनावों में, मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में 162 में से 160 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत दर्ज किया - जुल्फिकार अली भुट्टो की पीपीपी ने पश्चिमी पाकिस्तान में 86 सीटें जीतीं.

अवामी लीग की जीत के बावजूद, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल याह्या खान, जो उस समय मार्शल लॉ के माध्यम से देश पर शासन कर रहे थे, ने मुजीबुर रहमान को सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया. इससे पूर्वी पाकिस्तान में अशांति फैल गई, जहां बंगाली सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरित और उर्दू थोपे जाने के खिलाफ आंदोलन पहले से ही चल रहा था.

7 मार्च, 1971 को, मुजीब ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों से बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए एक व्यापक संघर्ष के लिए खुद को तैयार करने का आह्वान किया. जवाब में, पाकिस्तानी सेना ने अपना कुख्यात ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया - विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए एक सैन्य अभियान जिसके कारण व्यापक हत्याएं, अवैध गिरफ्तारियां और बलात्कार और आगजनी का क्रूर अभियान चला.

इसके तुरंत बाद, पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, जिसके कारण बांग्लादेश मुक्ति युद्ध छिड़ गया, जिसमें भारत ने हस्तक्षेप किया. इन सैनिकों ने नागरिकों के साथ मिलकर मुक्ति वाहिनी का गठन किया और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध किया.

आजादी के पहले 2 दशक में कई तख्ता पलट

बांग्लादेश को स्वतंत्रता मिलने के बाद, मुक्ति वाहिनी के सदस्य बांग्लादेश सेना का हिस्सा बन गए. हालांकि, स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में, उन बंगाली सैनिकों के खिलाफ भेदभाव के कारण सेना के भीतर तनाव उभरने लगा, जिन्होंने मुक्ति युद्ध की अगुवाई में पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह नहीं किया था.

यह असंतोष 15 अगस्त, 1975 को उबल पड़ा, जब मुट्ठी भर युवा सैनिकों ने बंगबंधु और उनकी बेटियों शेख हसीना (पूर्व प्रधानमंत्री जो 5 अगस्त की शाम को भारत पहुंचीं) और शेख रेहाना (जो सोमवार को हसीना के साथ भारत आई थीं) को छोड़कर उनके पूरे परिवार की ढाका स्थित उनके आवास पर हत्या कर दी.

इसने बांग्लादेश में मेजर सैयद फारुक रहमान, मेजर खांडेकर अब्दुर रशीद और राजनेता खोंडेकर मुस्ताक अहमद के नेतृत्व में पहले सैन्य तख्तापलट का रास्ता तैयार किया. एक नई व्यवस्था स्थापित हुई - मुस्ताक अहमद राष्ट्रपति बने और मेजर जनरल जियाउर रहमान को नया सेना प्रमुख नियुक्त किया गया.

हालांकि, नए शासक लंबे समय तक सत्ता में नहीं रहे. 3 नवंबर को, ब्रिगेडियर खालिद मुशर्रफ, जिन्हें मुजीब के समर्थक के रूप में देखा जाता था, ने एक और तख्तापलट का नेतृत्व किया और खुद को नया सेना प्रमुख नियुक्त किया. मुशर्रफ ने जियाउर रहमान को घर में नजरबंद कर दिया, क्योंकि उनका मानना ​​था कि बंगबंधु की हत्या के पीछे जियाउर रहमान का हाथ था और फिर 7 नवंबर को तीसरा तख्तापलट हुआ. 

इसे वामपंथी सैन्य कर्मियों ने जातीय समाजतांत्रिक दल के वामपंथी राजनेताओं के सहयोग से शुरू किया था. इस घटना को सिपाही-जनता बिप्लब (सैनिक और जन क्रांति) के रूप में जाना जाता था. मुशर्रफ की हत्या कर दी गई और जियाउर रहमान राष्ट्रपति बन गए.

जियाउर रहमान ने 1978 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का गठन किया, जिसने उस वर्ष के आम चुनाव में जीत हासिल की. ​​लेकिन 1981 में, मेजर जनरल मंजूर के नेतृत्व वाली एक विद्रोही सेना इकाई ने उन्हें खुद ही उखाड़ फेंका. विद्रोहियों ने राष्ट्रपति पर उन सैनिकों का पक्ष लेने का आरोप लगाया, जिन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भाग नहीं लिया था - और जो आजादी के बाद पश्चिमी पाकिस्तान से आए थे.

जनरल इरशाद का तख्तापलट

24 मार्च, 1982 को, तत्कालीन सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद ने रक्तहीन तख्तापलट में सत्ता संभाली, संविधान को निलंबित कर दिया और मार्शल लॉ लागू कर दिया - उन्होंने राष्ट्रपति अब्दुस सत्तार (बीएनपी) को उखाड़ फेंका, जो जियाउर रहमान के उत्तराधिकारी थे.

इरशाद ने 1986 में जातीय पार्टी की स्थापना की और 1982 के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में पहले आम चुनाव की अनुमति दी. उनकी पार्टी ने बहुमत हासिल किया और इरशाद 1990 तक राष्ट्रपति बने रहे - देश में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा.

1990 के दशक के बाद सेना का दखल

हालांकि 1991 में बांग्लादेश में संसदीय लोकतंत्र की वापसी हुई, लेकिन सेना का हस्तक्षेप बंद नहीं हुआ. 2006 में, बीएनपी-जमात सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हो गई. नए चुनाव होने से पहले आवश्यक कार्यवाहक सरकार का नेतृत्व करने के लिए उम्मीदवार चुनने को लेकर बीएनपी और अवामी लीग में ठन गई. उस साल अक्टूबर में, राष्ट्रपति इयाजुद्दीन अहमद ने खुद को कार्यवाहक सरकार का नेता घोषित किया और घोषणा की कि अगले वर्ष जनवरी में चुनाव होंगे. 

हालांकि, 11 जनवरी, 2007 को सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मोइन अहमद ने सैन्य तख्तापलट का नेतृत्व किया, जिससे सैन्य समर्थित कार्यवाहक सरकार बनी. अर्थशास्त्री फखरुद्दीन अहमद को सरकार का मुखिया नियुक्त किया गया, जबकि राष्ट्रपति इयाजुद्दीन अहमद को अपना राष्ट्रपति पद बनाए रखने के लिए मजबूर होना पड़ा.

मोईन ने सेना प्रमुख के रूप में अपना कार्यकाल एक साल और कार्यवाहक सरकार का शासन दो साल के लिए बढ़ा दिया. दिसंबर में राष्ट्रीय चुनाव होने के बाद 2008 में सैन्य शासन समाप्त हो गया और शेख हसीना सत्ता में आईं. 2008 के बाद से सेना का बांग्लादेश की सरकार में दखल भले ही बंद हो गया लेकिन 2024 में उसने एक बार फिर से वापसी की है और अब तो आने वाला समय ही बताएगा कि ये देश के भविष्य के लिए किस करवट बैठता है.