गाजा बोर्ड ऑफ पीस में मेंबरशिप के लिए चुकाने होंगे 9000 करोड़, ट्रंप ने भारत-पाक समेत 60 देशों को दिया न्यौता
डोनाल्ड ट्रंप के गाजा बोर्ड ऑफ पीस प्रस्ताव ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है. 9000 करोड़ रुपये की स्थायी सदस्यता और 60 देशों को न्यौते ने इसे यूएन के विकल्प के रूप में देखने की बहस को जन्म दिया है.
नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गाजा बोर्ड ऑफ पीस प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. भारत, पाकिस्तान, इटली, तुर्की समेत करीब 60 देशों को इस प्रस्तावित बोर्ड में शामिल होने का न्यौता भेजा गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक यह न्यौता पूरी तरह मुफ्त नहीं है.
अगर कोई देश इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता चाहता है तो उसे 9000 करोड़ रुपये का योगदान देना होगा. ट्रंप द्वारा भेजे गए निमंत्रण पत्रों के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह पहल केवल गाजा संकट के समाधान तक सीमित है या फिर यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रभाव को चुनौती देने की कोशिश है.
क्या है इसका उद्देश्य?
गाजा बोर्ड ऑफ पीस को शुरुआत में गाजा में युद्धविराम और उसके बाद की व्यवस्था की निगरानी के लिए प्रस्तावित किया गया है लेकिन जिस तरह से अलग अलग देशों को इसमें शामिल होने का न्यौता दिया जा रहा है, उससे इसे एक नई वैश्विक संस्था के रूप में देखा जा रहा है.
निमंत्रण पत्रों में क्या बताया गया है?
निमंत्रण पत्रों में बोर्ड ऑफ पीस को वैश्विक विवादों को सुलझाने का नया और साहसिक मंच बताया गया है. इसमें यह भी कहा गया है कि यह व्यवस्था मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अलग सोच के साथ काम करेगी. यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इसे एक ट्रांजिशनल गवर्निंग एडमिनिस्ट्रेशन के तौर पर देख रहे हैं.
रिपोर्ट के अनुसार क्या आया सामने?
इस प्रस्ताव की सबसे विवादित बात इसकी सदस्यता प्रणाली है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार जो देश 1 अरब डॉलर का योगदान देंगे, उन्हें स्थायी सदस्यता मिलेगी. वहीं बिना किसी आर्थिक योगदान के केवल तीन साल की अस्थायी सदस्यता का विकल्प भी रखा गया है.
आलोचकों का कहना है कि इससे वैश्विक शासन व्यवस्था पैसे पर आधारित हो जाएगी. निमंत्रण पत्रों में यह भी उल्लेख किया गया है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अमेरिका की 20 सूत्रीय गाजा युद्धविराम योजना का समर्थन किया है.
इस योजना में क्या है शामिल?
इस योजना में बोर्ड ऑफ पीस की स्थापना शामिल है. इसे इस तरह देखा जा रहा है कि अमेरिका UNSC की वैधता का इस्तेमाल करते हुए एक अलग निर्णय लेने वाला मंच खड़ा कर रहा है.
गौर करने वाली बात यह है कि ट्रंप प्रशासन अब तक 31 संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों से खुद को अलग कर चुका है और फंडिंग में कटौती कर चुका है. ऐसे में यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या गाजा बोर्ड ऑफ पीस भविष्य में संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने की कोशिश है.
और पढ़ें
- 'अमेरिका पर 93 अरब यूरो का लगाएंगे टैरिफ', ग्रीनलैंड टैरिफ की धमकी के जबाव में यूरोपीय संघ ने किया ऐलान
- 'खामेनेई पर हमला मतलब पूरे राष्ट्र के खिलाफ युद्ध', ट्रंप के नेतृत्व परिवर्तन वाले बयान पर ईरान ने अमेरिका को दी कड़ी चेतावनी
- चिली के जंगलों में लगी आग, राष्ट्रपति बोरिक ने घोषित की इमरजेंसी; 18 लोगों की गई जान