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डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले साल का लेखा-जोखा, वादों, फैसलों और विवादों का दौर

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरा कर लिया. हालांकि इस एक साल में उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जिससे ने केवल अमेरिका बल्कि पूरे दुनिया में हलचल ला दी.

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Shanu Sharma

नई दिल्ली: डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार सत्ता में वापसी करते हुए अमेरिका के सुनहरे युग की घोषणा की थी. अपने शपथ ग्रहण के दौरान ही उन्होंने अमेरिका फर्स्ट नीति को सख्ती से लागू करने का संकल्प लिया था. सत्ता संभालते ही उन्होंने आक्रामक अंदाज दिखाया.

ट्रंप ने शपथ ग्रहण करते ही पहले के कुछ घंटों में 200 से अधिक कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए. जिनमें पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के दौर के करीब 80 आदेशों को रद्द करना और 6 जनवरी के कैपिटल दंगे से जुड़े लगभग 1,500 दोषियों को माफी देना शामिल था. उनके फैसलों ने ही तीखी बहस को जन्म दिया था. 

विश्व शांती का दावा

अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुद को वैश्विक शांतिदूत के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन उनके फैसले अक्सर विवादों में घिरे रहे. गाजा में इज़राइल-हमास युद्ध के दौरान युद्धविराम कराना उनकी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना गया, जो अब अपने दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है. हालांकि, दूसरी ओर वेनेजुएला में जमीनी सैन्य कार्रवाई, निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और ड्रग्स तस्करी से जुड़े अभियानों में बड़ी संख्या में मौतों के आरोपों ने सवाल खड़े किए. इसके साथ ही ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क और यूरोपीय सहयोगियों से बढ़ता तनाव भी उनकी आक्रामक विदेश नीति का उदाहरण बना.


यूक्रेन युद्ध को पहले दिन खत्म करने का वादा आज भी अधूरा है और ट्रंप खुद मान चुके हैं कि यह संघर्ष उनकी सोच से कहीं अधिक जटिल है. अवैध इमिग्रेशन पर ट्रंप ने अपने चुनावी वादे को सख्ती से लागू किया. रिपोर्टों के अनुसार, दशकों में पहली बार अमेरिका में नेट माइग्रेशन नकारात्मक रहा. होमलैंड सिक्योरिटी विभाग का दावा है कि छह लाख से अधिक लोगों को देश से निकाला गया. ICE के ऑपरेशनों का विस्तार हुआ, लेकिन इसके खिलाफ कानूनी विरोध और प्रदर्शन भी तेज हुए. जनमत सर्वेक्षणों से साफ है कि देश इस मुद्दे पर बंटा हुआ है. 

DOGE और टैरिफ की दुनिया में चर्चा

ट्रंप प्रशासन ने फेडरल सरकार को छोटा और कुशल बनाने के लिए एलोन मस्क के साथ मिलकर डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) की शुरुआत की. USAID को बंद करना और हजारों कर्मचारियों की छंटनी इसके प्रमुख कदम रहे. हालांकि, खर्च में कटौती को लेकर किए गए दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खा सके. जहां अभियान में दो ट्रिलियन डॉलर की बचत का वादा था, वहीं शुरुआती महीनों में केवल सीमित बचत ही सामने आई.

आर्थिक मोर्चे पर ट्रंप ने बड़े पैमाने पर टैरिफ लागू कर अपने समर्थकों को संदेश दिया कि वे घरेलू उद्योग को प्राथमिकता दे रहे हैं. लिबरेशन डे पर घोषित टैरिफ ने बाजारों में हलचल मचा दी और शेयर बाजार को भारी नुकसान उठाना पड़ा. बाद में कुछ टैरिफ पर रोक लगाकर व्यापारिक समझौतों की कोशिश की गई. कई देशों के साथ समझौते हुए और कुछ जरूरी आयातों को छूट भी दी गई.