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मंगल ग्रह पर वैज्ञानिक जिसे समझ रहे थे पानी, AI ने उसे बताया..., अब कैसे बसेगी मानव बस्ती?

शोध से पुष्टि हुई कि इन धारियों के निर्माण के लिए तरल पानी की जरूरत नहीं है. धूल और महीन रेत के सूखे भू-स्खलन—यानी ढलानों से नीचे खिसकने—को इसका मुख्य कारण पाया गया.

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Sagar Bhardwaj

मार्स की ढलानों पर दिखने वाली रहस्यमयी काली धारियों को लेकर वैज्ञानिकों में लंबे समय से यह बहस थी कि क्या ये नमकीन बहते पानी के संकेत हैं या सिर्फ सूखी धूल की हरकत. यूनिवर्सिटी ऑफ बर्न के नए एआई-आधारित अध्ययन ने साफ कर दिया है कि इन धारियों में तरल पानी का कोई सबूत नहीं है. नासा व ईसा के मिशन डेटा के विश्लेषण में पता चला कि ये धारियां मुख्य रूप से हवा, धूल और सूखे भू-स्खलन से बनती हैं.

प्राकृतिक सूखी प्रक्रिया का परिणाम

शोध से पुष्टि हुई कि इन धारियों के निर्माण के लिए तरल पानी की जरूरत नहीं है. धूल और महीन रेत के सूखे भू-स्खलन—यानी ढलानों से नीचे खिसकने—को इसका मुख्य कारण पाया गया. हवा के झोंके, धूल की परतें और मौसमी बदलाव इन अंधेरी रेखाओं के बनने में अहम भूमिका निभाते हैं. अध्ययन बताता है कि यह घटना पूरी तरह सूखे प्रक्रियाओं पर आधारित है.

तरल पानी न होने के बावजूद, ये काली धारियां हर साल इतनी धूल उभारती हैं कि उनका प्रभाव वैश्विक डस्ट स्टॉर्म जितना हो सकता है. इससे वैज्ञानिकों को मंगल की सतह, वातावरण और जल-विक्षेपण के इतिहास को समझने में नई जानकारी मिली है. यह निष्कर्ष इस सवाल पर भी रोशनी डालता है कि कब और कैसे मंगल ने अपना पानी खोया.

क्या गृह पर जीवन की संभावनाएं खत्म

तरल पानी की अनुपस्थिति का मतलब यह नहीं कि ग्रह पर जीवन की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई लेकिन यह स्पष्ट है कि वर्तमान सतह-गतिविधियां सूखे पर्यावरण की ओर संकेत करती हैं. ऐसे निष्कर्ष आगे आने वाले मिशनों—ऑर्बिटर और रोवर—की रणनीतियों में अहम बदलाव ला सकते हैं.

वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल की बदलती सतह को लगातार मॉनिटर करना जरूरी है. ऑर्बिटर द्वारा हासिल विस्तृत तस्वीरें ही यह समझने में मदद करेंगी कि ग्रह का जलवायु इतिहास कैसा रहा और भविष्य के मानव मिशनों के लिए कौन-सी जगहें उपयुक्त होंगी.