जब मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी में बदल गई सरकार, कहानी भारतीय राजनीति के सबसे बड़ा सत्ता संकट की
1984 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव को उनकी गैरमौजूदगी में राज्यपाल ने पद से हटा दिया और नादेंडला भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया. बहुमत के विवाद ने राजनीतिक संकट पैदा किया, जिसके बाद NTR दोबारा सत्ता में लौटे.
भारतीय राजनीति में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है यह देखना कि कोई मुख्यमंत्री उस कुर्सी से हटता कैसे है.
आमतौर पर मुख्यमंत्री चुनाव हारता है, बहुमत खोता है या खुद इस्तीफा देता है. लेकिन भारतीय राजनीति में एक दौर ऐसा भी रहा है, जब राजभवन से निकला एक फैसला पूरी सरकार को रातोंरात बदल देता था. ऐसी ही एक घटना 1984 में आंध्र प्रदेश में हुई थी.
15 अगस्त 1984. देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था. लेकिन आंध्र प्रदेश की राजनीति में सत्ता का सबसे बड़ा उलटफेर हो चुका था. मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव, जिन्हें लोग NTR के नाम से जानते थे, अमेरिका में दिल की सर्जरी के लिए गए हुए थे. उसी दौरान राज्यपाल ठाकुर रामलाल ने उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया और उनके वित्त मंत्री नादेंडला भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.
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यह सिर्फ एक मुख्यमंत्री को हटाने की कहानी नहीं थी. यह उस दौर की कहानी थी जब यह सवाल देशभर में उठने लगा था कि आखिर किसी राज्य की सरकार का फैसला विधानसभा करेगी या राजभवन?
एक फिल्म स्टार ने कांग्रेस के गढ़ में बना दी थी सरकार
कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. 1980 के दशक की शुरुआत में आंध्र प्रदेश की राजनीति पर कांग्रेस का मजबूत प्रभाव था. इसी दौर में तेलुगु फिल्मों के सुपरस्टार एन.टी. रामाराव ने राजनीति में कदम रखा और 1982 में तेलुगु देशम पार्टी यानी TDP बनाई. सिर्फ कुछ महीनों में उन्होंने राज्य की राजनीति का समीकरण बदल दिया.
1983 के विधानसभा चुनाव में TDP ने शानदार प्रदर्शन किया और NTR मुख्यमंत्री बने. वह आंध्र प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे. उनका उभार सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं था. यह उस समय की राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता और दिल्ली-केंद्रित राजनीति के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा गया.
NTR की लोकप्रियता इतनी तेजी से बढ़ी कि वह जल्द ही सिर्फ आंध्र प्रदेश के नेता नहीं रहे. वह केंद्र में कांग्रेस के सामने खड़े होने वाले प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं में शामिल हो गए. और यहीं से कहानी में राजनीति का दूसरा रंग आता है.
NTR के सबसे करीबी लोगों में से एक थे भास्कर राव. नादेंडला भास्कर राव NTR के वित्त मंत्री थे और TDP के शुरुआती दौर के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल थे, लेकिन समय के साथ दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगे.
भास्कर राव और उनके समर्थकों का आरोप था कि NTR का शासन चलाने का तरीका ठीक नहीं था. दूसरी तरफ NTR के समर्थक इसे सत्ता के भीतर पैदा हुई बगावत मानते थे.
1984 तक दोनों के बीच टकराव इतना बढ़ गया कि भास्कर राव ने दावा किया कि उनके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन है. लेकिन एक बड़ा सवाल था. अगर मुख्यमंत्री के पास बहुमत नहीं है, तो इसका फैसला बंद कमरों में होगा या विधानसभा के फर्श पर? यही सवाल अगले एक महीने तक आंध्र प्रदेश की राजनीति का केंद्र बना रहा.
फिर आया 15 अगस्त का दिन. NTR इलाज के लिए अमेरिका में थे. इसी दौरान राज्यपाल ठाकुर रामलाल ने NTR को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया और नादेंडला भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया. NTR ने इस्तीफा नहीं दिया था और उनका कहना था कि उन्हें विधानसभा में बहुमत हासिल है.
इस घटनाक्रम ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया, क्योंकि मुख्यमंत्री को हटाने का आधार यह था कि उनके पास बहुमत नहीं है, लेकिन बहुमत का परीक्षण विधानसभा में नहीं हुआ था. विपक्षी दलों ने राज्यपाल की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए और इस फैसले को लोकतांत्रिक जनादेश के खिलाफ बताया.
यही वह बिंदु था जहां मुख्यमंत्री की कुर्सी की लड़ाई अचानक राज्यपाल बनाम विधानसभा की बहस में बदल गई. NTR अमेरिका से लौटे और शुरू हुआ 'लोकतंत्र बचाओ' अभियान
सर्जरी के बाद NTR भारत लौटे. उन्होंने भास्कर राव के दावे को चुनौती दी और अपने समर्थक विधायकों की संख्या दिखाने की कोशिश की. रिपोर्टों के मुताबिक, NTR समर्थक विधायकों को एक साथ रखा गया ताकि उन्हें तोड़ने या खरीद-फरोख्त की आशंका से बचाया जा सके.
NTR ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र पर हमला बताया. इसके बाद उनकी लड़ाई सिर्फ आंध्र प्रदेश तक सीमित नहीं रही. देशभर के गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दल उनके समर्थन में आने लगे. यह वही दौर था जब क्षेत्रीय दल केंद्र की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे.NTR की लड़ाई ने उन्हें अचानक राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति के बड़े चेहरे में बदल दिया.
दिल्ली पर भी दबाव बढ़ने लगा
आंध्र प्रदेश में विरोध लगातार बढ़ रहा था. NTR ने जनता के बीच जाकर अपनी सरकार बहाल करने की मांग की. दूसरी तरफ भास्कर राव सरकार को अपने बहुमत का दावा साबित करना था. स्थिति ऐसी बन गई कि केंद्र सरकार पर भी दबाव बढ़ने लगा. आखिरकार राज्यपाल ठाकुर रामलाल को हटा दिया गया और उनकी जगह शंकर दयाल शर्मा को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया.
नए राज्यपाल के सामने अब असली सवाल था—किसके पास बहुमत है? इसका जवाब राजभवन में नहीं, विधानसभा में मिलना था.
एक महीने बाद पलट गई पूरी कहानी
भास्कर राव सरकार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सके. 16 सितंबर 1984 को NTR को दोबारा सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया और वह फिर मुख्यमंत्री बन गए. भास्कर राव का मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल सिर्फ 31 दिन रहा, जो आंध्र प्रदेश के इतिहास में सबसे छोटे मुख्यमंत्रित्व कालों में से एक रहा. यानी जिस मुख्यमंत्री को एक महीने पहले हटाया गया था, वही फिर वापस आ गया.
स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक टकराव कई बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा. कई मामलों में राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठे और कई बार सरकारों को अनुच्छेद 356 के तहत हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाया गया.
1959 में केरल की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त किया गया. 1977 में जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने नौ कांग्रेस शासित राज्य सरकारों को हटाया. 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद नौ राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया. इससे साफ था कि केंद्र में सत्ता बदलने का असर राज्यों की सरकारों पर भी पड़ सकता था.
लेकिन NTR का मामला थोड़ा अलग था. यहां सीधे राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया गया था. एक मौजूदा मुख्यमंत्री को हटाकर उसी विधानसभा से दूसरे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया गया था. यही वजह है कि यह मामला भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित सत्ता-परिवर्तनों में गिना जाता है.
राज्यपाल के पास आखिर कितनी ताकत है?
यहीं से मामला संविधान की तरफ जाता है. राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है. लेकिन संसदीय व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिका मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद होती है. जब यह सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री के पास बहुमत है या नहीं, तो सबसे महत्वपूर्ण कसौटी विधानसभा में बहुमत परीक्षण होती है. बाद के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने इसी सिद्धांत को कई महत्वपूर्ण फैसलों में मजबूत किया.
विशेष रूप से 1994 का एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ फैसला भारतीय संघीय व्यवस्था के लिए मील का पत्थर माना जाता है. नौ न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद 356 और राज्य सरकारों को हटाने की शक्ति की न्यायिक समीक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए. अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र की कार्रवाई मनमानी नहीं हो सकती और बहुमत के सवाल को विधानसभा के पटल पर परखा जाना चाहिए. इस फैसले ने राज्यों की निर्वाचित सरकारों को केंद्र के मनमाने हस्तक्षेप से काफी हद तक सुरक्षा दी.
1984 के NTR प्रकरण से 1994 के बोम्मई फैसले तक, इन दोनों घटनाओं के बीच लगभग एक दशक का अंतर था. लेकिन भारतीय राजनीति लगातार ऐसे उदाहरण देख रही थी, जिनमें राज्यपाल की भूमिका विवादों में रही.
1988 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई की सरकार के मामले ने आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा संवैधानिक विवाद पैदा किया. राज्यपाल ने उनकी सरकार के बहुमत पर सवाल उठाया था और बोम्मई को विधानसभा में शक्ति परीक्षण का पर्याप्त अवसर दिए जाने पर विवाद हुआ. 1994 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस पूरे विवाद को एक बड़े संवैधानिक सिद्धांत में बदल दिया.
अब यह सवाल सिर्फ किसी एक मुख्यमंत्री की कुर्सी का नहीं था. यह केंद्र और राज्य के बीच शक्ति संतुलन का सवाल था.
राजनीति में 'हाईकमान' का खेल भी कम महत्वपूर्ण नहीं
मुख्यमंत्री हटाने की दूसरी कहानी संवैधानिक नहीं, बल्कि पूरी तरह राजनीतिक है. भारत में लंबे समय तक राष्ट्रीय दलों में पार्टी नेतृत्व का प्रभाव बहुत मजबूत रहा है. कई राज्यों में मुख्यमंत्री का चयन निर्वाचित विधायकों से ज्यादा पार्टी नेतृत्व के फैसले से तय होता रहा.
इस व्यवस्था में मुख्यमंत्री को पता रहता है कि उसकी राजनीतिक ताकत सिर्फ विधानसभा में मौजूद विधायकों से नहीं आती. उसे पार्टी नेतृत्व का विश्वास भी बनाए रखना होता है. यही कारण है कि कई बार मुख्यमंत्री के खिलाफ असंतोष पहले दिल्ली या पार्टी मुख्यालय में दिखाई देता है और बाद में राज्य में नेतृत्व परिवर्तन होता है.
कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और कई दूसरे राज्यों की राजनीति में अलग-अलग समय पर ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं. लेकिन इन मामलों को 1984 के NTR प्रकरण के साथ पूरी तरह एक जैसा नहीं रखा जा सकता. क्योंकि NTR को हटाने का मामला सीधे राज्यपाल के संवैधानिक निर्णय और बहुमत के दावे से जुड़ा था.
1984 की घटना ने NTR को और बड़ा नेता बना दिया
राजनीति की विडंबना देखिए, जिस घटनाक्रम का उद्देश्य NTR को सत्ता से बाहर करना था, उसी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत कर दिया. उन्होंने खुद को सिर्फ मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि राज्यों के अधिकार और लोकतांत्रिक जनादेश की आवाज के रूप में पेश किया. गैर-कांग्रेसी दलों का उनके पीछे आना इसी बदलाव का संकेत था. बाद के वर्षों में केंद्र की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा और NTR जैसे नेताओं ने इस बदलाव को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इस अर्थ में 1984 का आंध्र प्रदेश संकट केवल एक राज्य की सरकार बदलने की घटना नहीं था. यह उस राजनीतिक परिवर्तन का भी हिस्सा था जिसमें दिल्ली के बाहर के नेता राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाने लगे.
लेकिन कहानी का एक और मोड़ भी था
NTR की राजनीतिक यात्रा में सत्ता से हटाए जाने की घटना आखिरी सत्ता संघर्ष नहीं थी. 1995 में उन्हें एक बार फिर सत्ता के संघर्ष का सामना करना पड़ा. इस बार चुनौती दिल्ली या राज्यपाल से नहीं, बल्कि उनकी अपनी पार्टी और परिवार के भीतर से आई.
उनके दामाद और तत्कालीन TDP नेता एन. चंद्रबाबू नायडू ने पार्टी के भीतर समर्थन जुटाया और अंततः NTR को मुख्यमंत्री पद से हटाकर खुद मुख्यमंत्री बने. अगस्त 1995 का यह घटनाक्रम भी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित आंतरिक सत्ता परिवर्तनों में गिना जाता है.