सदन से निष्कासन के क्या हैं नियम, क्या-क्या काम करने पर निकाले जा सकते हैं विधायक?
दिल्ली विधानसभा के मानसून सत्र में पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए. चर्चा की मांग को लेकर हुए हंगामे के बाद कुछ विधायकों को बाहर निकाला गया. यहां हम आपको ये बता रहे हैं कि सदन में विधायक के किन कामों पर कार्रवाई की जा सकती है.
दिल्ली विधानसभा के मानसून सत्र में पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए. चर्चा की मांग को लेकर हुए हंगामे के बाद कुछ विधायकों को बाहर निकाला गया. यहां हम आपको ये बता रहे हैं कि सदन में विधायक के किन कामों पर कार्रवाई की जा सकती है. विधानसभा में अनुशासनहीनता से जुड़े क्या नियम हैं और अध्यक्ष को किन परिस्थितियों में कार्रवाई का अधिकार मिलता है, चलिए जानते हैं.
सदन में किन गतिविधियों पर रोक?
विधानसभा और संसद की कार्यवाही तय नियमों और मर्यादाओं के तहत चलती है. सदस्यों को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन विरोध के लिए कुछ सीमाएं निर्धारित हैं. सदन में जानबूझकर कार्यवाही बाधित करना, वेल में जाकर नारे लगाना, असंसदीय या आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करना और बिना अनुमति बोलना अनुशासनहीनता के दायरे में आ सकता है. इसके अलावा पोस्टर, बैनर या तख्तियां दिखाना, विधेयकों या सरकारी दस्तावेजों की प्रतियां फाड़ना और सदन की कार्यवाही में किसी तरह का व्यवधान पैदा करना भी प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल है.
अध्यक्ष के पास क्या अधिकार होते हैं?
सदन की कार्यवाही व्यवस्थित ढंग से चलाने की जिम्मेदारी पीठासीन अधिकारी की होती है. लोकसभा के नियम 373, 374 और 374A तथा राज्यसभा के नियम 255 और 256 सदस्यों के अनुशासन से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख करते हैं. यदि कोई सदस्य बार-बार चेतावनी के बावजूद अपनी सीट पर वापस नहीं लौटता या सदन की कार्यवाही में लगातार बाधा डालता है, तो अध्यक्ष उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं. गंभीर स्थिति में सदस्य को मार्शल के जरिए सदन से बाहर भी कराया जा सकता है.
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निलंबन से लेकर निष्कासन तक कार्रवाई
अनुशासनहीनता की गंभीरता के आधार पर कार्रवाई अलग-अलग हो सकती है. नियम 373 के तहत सदस्य को दिन की शेष कार्यवाही से बाहर किया जा सकता है. वहीं गंभीर या लगातार व्यवधान की स्थिति में नियम 374 के तहत निलंबन की कार्रवाई का प्रावधान है. इसके अलावा पार्टी के आधिकारिक निर्देश के खिलाफ मतदान करने पर दलबदल विरोधी कानून के तहत भी कार्रवाई का खतरा हो सकता है. हालांकि यह कार्रवाई परिस्थितियों और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करती है.
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने और जनहित के मुद्दे उठाने का पूरा अधिकार है. लेकिन विरोध का तरीका भी सदन की निर्धारित मर्यादाओं के अनुरूप होना जरूरी है. सदन में लगातार हंगामा होने से न केवल महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा प्रभावित होती है, बल्कि विधानसभा का बहुमूल्य समय भी नष्ट होता है.