TMC ने सभी पार्टी संगठनों को तत्काल प्रभाव से किया भंग, बागी विधायकों ने बढ़ाई आलाकमान की टेंशन
तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अंदरूनी कलह के बीच अपनी सभी संगठनात्मक समितियों को अचानक भंग कर दिया है. पार्टी के 59 बागी विधायकों ने विधानसभा में खुद को मुख्य विपक्षी दल घोषित करने की मांग की है.
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक से बढ़कर वक घटनाक्रम सामने आ रहे हैं. सबसे बड़ा ट्विस्ट तृणमूल कांग्रेस संगठन में देखने को मिल रहा है, जहां पार्टी दो गुटों में बंटती नजर आ रही है. पूर्व सीएम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के भीत़र चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर बगावत के रूप में सामने आ चुकी है. इसी कड़ी में पार्टी आलाकमान ने राज्य की सभी छोटी-बड़ी कमेटियों को तत्काल प्रभाव से खत्म कर दिया है.
पार्टी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर बयान जारी करते हुए पश्चिम बंगाल की अपनी सभी मुख्य संगठनात्मक समितियों के साथ-साथ सभी सहयोगी विंग्स को भी पूरी तरह भंग करने का एलान किया है. तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि वह अब जमीनी स्तर पर अपने कामकाज की समीक्षा और व्यापक आत्म-निरीक्षण करेगी. इस प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद ही पूरे संगठन का नए सिरे से पुनर्गठन किया जाएगा.
फर्जी दस्तखत और विधायकों की खुली बगावत
हालांकि, पार्टी ने इस कड़े फैसले के पीछे चल रहे विवादों का आधिकारिक तौर पर कोई सीधा जिक्र नहीं किया है, मगर राजनीतिक गलियारों में साफ है कि यह कदम पिछले कुछ दिनों से जारी 'फर्जी हस्ताक्षर' विवाद और विधायकों के एक बहुत बड़े धड़े द्वारा ममता बनर्जी के खिलाफ झंडा बुलंद करने के बाद उठाया गया है. बुधवार को यह संकट उस वक्त और गहरा गया जब बागी विधायक एकजुट होकर विधानसभा भवन पहुंच गए.
59 बागी विधायकों ने विधानसभा में ठोका दावा
तृणमूल कांग्रेस के 59 बागी विधायकों ने बुधवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंचकर खुद को सदन के भीतर मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता देने की औपचारिक मांग की. इस बागी गुट में ममता सरकार के पूर्व कद्दावर मंत्री जावेद अहमद खान, अरूप रॉय, चंद्रनाथ सिन्हा और सबीना यास्मीन जैसे बड़े नाम शामिल हैं. गौरतलब है कि इन बागी विधायकों में से कई नेता केंद्रीय जांच एजेंसियों सीबीआई और ईडी की जांच का सामना भी कर रहे हैं.
टीएमसी के बागी विधायकों की अगुवाई कर रहे निष्कासित विधायक संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उनके पास सदन के दो-तिहाई से अधिक सदस्यों का खुला समर्थन है. दरअसल, विधानसभा में कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए बागी गुट को कम से कम 52 विधायकों के दस्तखत की जरूरत थी. विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को सौंपे गए पत्र पर 59 विधायकों ने हस्ताक्षर किए हैं.
बैठकों में लगातार घटती रही विधायकों की संख्या
ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती देने वाली इस बगावत की पटकथा पिछले महीने ही लिखनी शुरू हो गई थी. मुख्यमंत्री आवास पर 6 मई को बुलाई गई विधायक दल की पहली बैठक में कुल 80 विधायकों में से केवल 69 सदस्य ही शामिल हुए थे. इसके बाद 19 मई को हुई बैठक में यह संख्या घटकर 64 रह गई. हद तो तब हो गई जब 31 मई को हुई आखिरी समीक्षा बैठक में केवल 19 वफादार विधायक ही ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आए.