'आजीविका के लिए महिला का मर्जी से वेश्यावृत्ति करना अपराध नहीं', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बालिगों द्वारा मर्जी से किया गया सेक्स वर्क अपराध नहीं है और उन्हें पुलिस परेशान न करे. कानून का मकसद मानव तस्करी रोकना है, न कि सहमति से बने संबंधों को सजा देना.
नई दिल्ली: समाज में अक्सर जिस विषय पर खुलकर बात करने से परहेज किया जाता है उसी को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो सदियों पुरानी सोच को बदलने की ताकत रखता है. कानून की चौखट से निकला यह आदेश सीधे तौर पर इंसानी गरिमा और अधिकारों से जुड़ा है.
सुप्रीम कोर्ट ने 70 साल पुराने 'इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट' यानी आईटीपीए ITPA का बारीकी से अध्ययन करने के बाद एक बेहद अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर कोई बालिग अपनी मर्जी से सेक्स वर्क यानी वेश्यावृत्ति का रास्ता चुनता है तो इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए. जजों ने कहा कि ऐसे लोगों को सिर्फ उनके पेशे की वजह से न तो गिरफ्तार किया जा न परेशान किया जाए और न ही उन पर कोई बेवजह की कानूनी कार्रवाई की जाए.
एडल्ट्स को सजा देना नहीं है मकसद
अदालत ने ये भी समझाया कि आईटीपीए कानून का असली मकसद सेक्स वर्क को पूरी तरह खत्म करना या अपनी मर्जी से इसमें शामिल एडल्ट्स को सजा देना नहीं है. इसके बजाय इस कानून का मुख्य उद्देश्य मानव तस्करी, जबरदस्ती और दबाव के जरिए लोगों का व्यावसायिक शोषण रोकना है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के मुताबिक अगर किसी को धोखे, झांसे या मजबूरी का फायदा उठाकर इस दलदल में धकेला जाता है तो वह कानूनन एक गंभीर अपराध बना रहेगा और ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मर्जी से किए जाने वाले सेक्स वर्क और कानूनन प्रतिबंधित गतिविधियों के बीच का अंतर भी बिल्कुल साफ कर दिया है. अदालत ने कहा कि बालिगों द्वारा आपसी सहमति से किया जाने वाला सेक्स वर्क भले ही गैर-कानूनी न हो लेकिन कोठा यानी वेश्यालय चलाना या व्यावसायिक सेक्स एक्टिविटी के लिए अपनी संपत्ति का इस्तेमाल करने देना अभी भी एक दंडनीय अपराध है.
इन धाराओं में अभी भी माना जाएगा अपराध
आईटीपीए की धारा 3 के तहत वेश्यालय चलाने या उसके लिए जगह देने पर जेल और जुर्माना दोनों हो सकता है. वहीं धारा 4 किसी सेक्स वर्कर की कमाई पर जिंदगी बसर करने को अपराध मानती है. धारा 5 किसी को इस धंधे के लिए मजबूर करने या तस्करी करने से रोकती है और धारा 7 सार्वजनिक व धार्मिक स्थलों के पास इस काम पर पाबंदी लगाती है.
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि देश के हर नागरिक की तरह सेक्स वर्कर्स को भी सम्मान से जीने और कानूनी सुरक्षा पाने का पूरा हक है. जजों ने पुलिस और प्रशासनिक एजेंसियों को भी नसीहत दी है कि वे ऐसे मामलों में संवेदनशीलता से काम लें और अपनी मर्जी से यह काम करने वाले ए़डल्ट्स को बेवजह परेशान न करें.