चुनाव से पहले आरक्षण पर घमासान, बीजेपी के सामने फिर सवर्ण और OBC-दलित वोट के संतुलन की चुनौती

आगामी विधानसभा चुनावों से पहले आरक्षण का मुद्दा फिर गरमा गया है. सवर्ण संगठन बदलाव की मांग कर रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे आरक्षण खत्म करने की कोशिश बता रहा है. इससे बीजेपी की चिंता बढ़ी है.

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Kuldeep Sharma

उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनावी माहौल बनने के साथ आरक्षण और जातिगत राजनीति फिर चर्चा के केंद्र में है. दिल्ली और लखनऊ में सवर्ण संगठनों के प्रदर्शन के बीच विपक्षी दल बीजेपी पर हमलावर हैं. पार्टी के सामने अपने पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं और OBC-दलित आधार को साथ रखने की चुनौती है.

दिल्ली से लखनऊ तक आरक्षण पर प्रदर्शन

आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर सवर्ण युवाओं और सामाजिक संगठनों का प्रदर्शन चर्चा में है. प्रदर्शनकारी जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा और आर्थिक स्थिति को आधार बनाने की मांग कर रहे हैं. उनकी कुछ मांगों में एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान लागू करना और मौजूदा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा शामिल है. 

इसी आंदोलन से जुड़े लोगों ने उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक से भी मुलाकात की. बताया गया कि पाठक ने उनकी मांगों को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का भरोसा दिया है. इसके बाद लखनऊ में भी प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारियों की ओर से विश्वविद्यालयों में दलित और ओबीसी छात्रों से कथित भेदभाव रोकने वाले यूजीसी नियमों को लेकर भी आपत्ति जताई गई है.


विपक्ष ने बीजेपी पर साधा निशाना

आरक्षण के मुद्दे पर सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों से बातचीत ने विपक्ष को बीजेपी पर हमला करने का मौका दे दिया है. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बसपा और आजाद समाज पार्टी के नेताओं ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरक्षण में सुधार की चर्चा को इसके अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश से जोड़ा और इसे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के हितों से जोड़ा.

बसपा प्रमुख मायावती ने भी चिंता जताई है. वहीं चंद्रशेखर आजाद ने आरक्षण व्यवस्था में किसी भी तरह के बदलाव का विरोध किया है. विपक्ष का तर्क है कि आरक्षण सामाजिक और ऐतिहासिक असमानता से जुड़े अधिकारों का विषय है, इसलिए इसमें बदलाव का कोई भी प्रयास चुनावी मुद्दा बन सकता है.

2024 की याद बीजेपी के लिए बनी चुनौती

आरक्षण का मुद्दा बीजेपी के लिए नया नहीं है. 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने संविधान और आरक्षण को अपने प्रमुख चुनावी मुद्दों में शामिल किया था. राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने लगातार यह सवाल उठाया कि बीजेपी को बड़ी बहुमत मिलने पर संविधान और आरक्षण खतरे में पड़ सकते हैं. बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया, लेकिन चुनाव परिणामों में पार्टी को कई महत्वपूर्ण राज्यों में नुकसान उठाना पड़ा. 

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की लोकसभा सीटें 29 कम हुईं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतीं. कांग्रेस की राष्ट्रीय सीट संख्या भी 47 से बढ़कर 99 हो गई. बीजेपी की चुनावी समीक्षा में संविधान और आरक्षण से जुड़े विपक्षी नैरेटिव को दलित और ओबीसी मतदाताओं के बीच असर डालने वाले कारणों में माना गया था.

सवर्ण और OBC-दलित वोट के बीच संतुलन की चुनौती

मौजूदा स्थिति बीजेपी के लिए इसलिए मुश्किल है क्योंकि पार्टी ने पिछले वर्षों में गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच अपना आधार मजबूत किया है. साथ ही सवर्ण समाज लंबे समय से उसका महत्वपूर्ण समर्थन आधार रहा है. ऐसे में आरक्षण को लेकर किसी एक पक्ष के पक्ष में स्पष्ट कदम उठाना राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है. 

यदि पार्टी सवर्ण संगठनों की मांगों के अनुरूप आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की दिशा में बढ़ती है, तो OBC और दलित मतदाताओं में नाराजगी पैदा होने की आशंका रहेगी. वहीं, मांगों को पूरी तरह नजरअंदाज करने पर पारंपरिक समर्थक वर्ग असंतुष्ट हो सकता है. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में चुनावी गतिविधियां बढ़ने के बीच यही संतुलन बीजेपी के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता दिख रहा है.