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'राम मंदिर पर न्याय नहीं, फैसला हुआ', मथुरा-काशी को लेकर भी बिफरे सपा सांसद

डॉ. एसटी हसन ने कहा कि ज्ञानवापी...फिर मथुरा इसके बाद ताज महल, कुतुबमीनार और दिल्ली की जामा मस्जिद. जब लोग 3,000 मस्जिदों पर दावा करते हैं, तो हमें सोचना होगा कि हम अपनी अगली पीढ़ियों को क्या दे रहे हैं

Gyanendra Sharma

नई दिल्ली: मुरादाबाद से समादवादी पार्टी के सासंद डॉ. एसटी हसन संसद में अपने भाषण में ज्ञानवापी मुद्दे पर अपना मत रखते हुए देश की मौजूदा हालात पर सवाल उठाए थे. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राम मंदिर का मुद्दा सुलझ गया, लेकिन यह एक फैसला था न्याय नहीं. एसटी हसन का कहना है कि राम मंदिर के बाद अब ज्ञानवापी का मुद्दा सामने आया है. 

'ज्ञानवापी...फिर मथुरा...फिर ताज महल'

डॉ. एसटी हसन ने कहा कि ज्ञानवापी...फिर मथुरा...फिर ताज महल, कुतुबमीनार और दिल्ली की जामा मस्जिद. जब लोग 3,000 मस्जिदों पर दावा करते हैं, तो हमें सोचना होगा कि हम अपनी अगली पीढ़ियों को क्या दे रहे हैं, प्यार या नफरत. हसन ने कहा कि मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर दावों का सिलसिला रुकना चाहिए. 

'राम मंदिर पर न्याय नहीं हुआ, फैसला सुनाया गया'

राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल पर डॉ.एसटी हसन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 6 दिसंबर 1992 को जो कुछ भी हुआ, वह अपराध था. यह भी स्वीकार किया कि (बाबरी) मस्जिद के नीचे मंदिर का कोई सबूत नहीं मिला. इसके बाद विवादित भूमि हिंदुओं को देकर दोनों समुदायों के बीच मामले को सुलझाने की कोशिश की गई. इस मुद्दे को लेकर दोनों समुदायों के बीच सैकड़ों वर्षों तक तनाव रहा. हम सभी सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं. सभी ने पहले ही आश्वासन दिया था कि जो भी निर्णय होगा, वे स्वीकार करेंगे. इसलिए वो मामला इतनी आसानी से सुलझ गया. इसीलिए मैंने कहा कि यह एक फैसला था, लेकिन न्याय नहीं हुआ.

'यह एक अंतहीन एजेंडा है'

ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने में कोर्ट ने हाल ही में पूजा की इजाजत दे दी है. इस मामले पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 है. धार्मिक स्थलों (बाबरी विवाद को छोड़कर) में यथास्थिति सुनिश्चित करने का इसका प्रावधान एक बड़ी राहत थी. हमें उम्मीद है कि कोर्ट कानून का पालन करेगा. निश्चित रूप से अदालत कानूनों के आधार पर निर्णय लेती है. लेकिन कट्टरपंथी ज्ञानवापी पर दावा कर रहे हैं, उसके बाद मथुरा, फिर ताज महल, दिल्ली की जामा मस्जिद, कुतुब मीनार और 3,000 अन्य मस्जिदों पर. यह एक अंतहीन एजेंडा है. क्या इससे देश के लिए अच्छा संदेश जा रहा है? हम अंदाजा लगा सकते हैं कि देश किधर जा रहा है. हमें उम्मीद है कि अदालतें सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने वाले फैसले लेंगी.

देश के नेता राजनीतिक भंवर में फंस गये...

मेरा मानना है कि पीएम मोदीजी, राजनाथ सिंह (रक्षा मंत्री), नितिन गडकरी (सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्री) आदि जैसे वरिष्ठ भाजपा नेता भी सांप्रदायिक सद्भाव को लेकर चिंतित हैं. लेकिन वे राजनीतिक भंवर में फंस गये हैं और उससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. देश में सभी पार्टियों के नेता देश के हितैषी हैं, लेकिन लोग आगे बढ़ने के लिए धार्मिक भावनाओं का सहारा लेकर राजनीति को सांप्रदायिक बनाने के आसान तरीके अपना रहे हैं.

एसटी हसन ने कहा- मैं एक सर्जन हूं. इस मौजूदा माहौल में भी, मैं हिंदुओं को मुसलमानों की जान बचाने के लिए रक्तदान करते हुए देखता हूं और इसके विपरीत भी. हमारा सौहार्द अभी तक खराब नहीं हुआ है और हम एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं.' लेकिन मन में शंकाएं घर कर गई हैं और दूरियां बढ़ती जा रही हैं.