Pingali Venkayya Birth Anniversary: कैंब्रिज से पढ़े, देश के लिए सब छोड़ दिया... फिर झोपड़ी में क्यों बीता तिरंगे के जनक का जीवन?
भारत के राष्ट्रीय ध्वज के अभिकल्पक पिंगली वेंकैया की जयंती पर उनके योगदान को देश याद कर रहा है . महात्मा गांधी की प्रेरणा से भारत के लिए अलग राष्ट्रीय ध्वज तैयार किया.
नई दिल्ली: जब भी तिरंगा शान से लहराता है, हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस तिरंगे की मूल परिकल्पना करने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने अपना पूरा जीवन देश को समर्पित कर दिया था. आज उनकी जयंती पर उनके योगदान को याद करना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है. उच्च शिक्षा, सरकारी नौकरी और उज्ज्वल भविष्य होने के बावजूद पिंगली वेंकैया ने देश सेवा को चुना. महात्मा गांधी के विश्वास के साथ उन्होंने भारत के लिए अलग राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने का बीड़ा उठाया. वर्षों की मेहनत और अध्ययन के बाद उनके डिजाइन को आधार बनाकर भारत के राष्ट्रीय ध्वज का स्वरूप तय हुआ.
कैसे शुरू हुआ देश के लिए अलग झंडा बनाने का सफर?
पिंगली वेंकैया का जन्म 2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टम में हुआ था. उन्होंने मद्रास से प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में अध्ययन किया. देश विदेश के ज्ञान और कई भाषाओं में दक्षता हासिल करने के बावजूद उनका अधिकांश जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित रहा. उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत का अपना अलग राष्ट्रीय ध्वज होना चाहिए.
सरकारी नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन का चुना रास्ता
कैंब्रिज से लौटने के बाद पिंगली वेंकैया ने रेलवे गार्ड और सरकारी कर्मचारी के रूप में कार्य किया. बाद में उन्होंने जापानी और उर्दू भाषा का अध्ययन भी किया. महज 19 वर्ष की आयु में वे ब्रिटिश सेना में अधिकारी बने और दक्षिण अफ्रीका के एंग्लो बोअर युद्ध में शामिल हुए. वहीं उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी.
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गांधी की सहमति से तैयार हुआ तिरंगे का प्रारूप
भारत लौटने के बाद पिंगली वेंकैया स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए. उनका सवाल था कि भारतीय आखिर विदेशी झंडे को क्यों सलाम करें. गांधी जी ने उन्हें राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने की जिम्मेदारी दी. वर्ष 1916 से 1921 के बीच उन्होंने दुनिया के कई देशों के झंडों का अध्ययन कर लगभग 30 डिजाइन तैयार किए, जिनमें तिरंगे का प्रारूप भी शामिल था.
यहीं से बना आज के राष्ट्रीय ध्वज का आधार
पिंगली वेंकैया के तैयार किए गए झंडे में बाद में कुछ संशोधन किए गए. सबसे ऊपर लाल रंग की जगह केसरिया रंग रखा गया और बीच में चरखे का चिन्ह जोड़ा गया. वर्ष 1931 में इस स्वरूप को स्वीकार किया गया. इसके बाद 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसी डिजाइन को आधार बनाकर राष्ट्रीय ध्वज को मंजूरी दी. बाद में चरखे की जगह अशोक चक्र शामिल किया गया.
देश को पहचान मिली, लेकिन रचनाकार गुमनाम रहे
पिंगली वेंकैया का सपना भारत को अपना राष्ट्रीय ध्वज दिलाना था, जो पूरा हुआ. हालांकि उन्हें वह पहचान जीवनकाल में नहीं मिल सकी, जिसके वे हकदार थे. 4 जुलाई 1963 को उनका निधन एक साधारण झोपड़ी में हुआ. वर्ष 2009 में भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी कर उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया.