पद्मश्री से सम्मानित एसिड अटैक सर्वाइवर मंगला कपूर और नक्सल बस्तर की बुधरी टाटी की अदम्य कहानी
भारत हर साल पद्मश्री सम्मान उन लोगों को देता है जिन्होंने अपनी मेहनत, साहस और लगन से समाज को नई दिशा दी.चलिए जानते हैं पद्मश्री से सम्मानित प्रोफेसर मंगला कपूर और बुधरी टाटी के बारे में.
नई दिल्ली: भारत हर साल पद्मश्री सम्मान उन लोगों को देता है जिन्होंने अपनी मेहनत, साहस और लगन से समाज को नई दिशा दी. इस बार दो ऐसी बहादुर महिलाओं की कहानियां पूरे देश को प्रेरित कर रही हैं, जो देशभर के लिए मिसाल बनकर उभरी हैं. इनमें से एक हैं प्रोफेसर मंगला कपूर, जिन्होंने एसिड अटैक का शिकार होने के बावजूद भी संगीत की दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बनाई. वहीं, दूसरी हैं बुधरी टाटी, जो नक्सल प्रभावित बस्तर में महिलाओं और बच्चों के लिए चुपचाप क्रांति लाईं. चलिए जानते हैं प्रोफेसर मंगला कपूर और बुधरी टाटी के बारे में.
कुछ ऐसा था प्रोफेसर मंगला कपूर का सफर:
प्रोफेसर मंगला कपूर भारतीय शास्त्रीय संगीत की जानी-मानी गुरु हैं. उनका जीवन सिर्फ संगीत की कहानी नहीं, बल्कि जिजीविषा (जाने की इच्छा) की मिसाल है. जब वे सातवीं क्लास में पढ़ती थीं, तब उनके चेहरे पर एसिड फेंक दिया गया. इस हमले में उनका चेहरा बुरी तरह जल गया, जिसके लिए उनकी करीब 37 सर्जरी हुईं. वहीं, एक दुर्घटना में उनकी दोनों जांघों की हड्डियां भी टूट गईं.
स्कूल में बच्चे उनका मजाक उड़ाते, उन्हें अजीब नामों से बुलाते और कुछ लोग देखकर डर भी जाते, लेकिन प्रो. मंगला ने हार नहीं मानी, उन्होंने अपना जीवन अच्छे से जीने के बारे में सोचा. उनके पिता का साथ और संगीत का सहारा उन्हें मजबूत बनाए रखा.
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मंगला कपूर ने बी.म्यूज और एम.म्यूज में गोल्ड मेडल जीता और पीएचडी भी पूरी की. शुरुआत में नौकरी के लिए आवेदन करने पर उनका मजाक बनाया जाता था, लेकिन आखिरकार बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के महिला महाविद्यालय में उन्हें लेक्चरर की नौकरी मिल गई. उन्हें काशी की लता मंगेशकर भी कहा जाता है. भारत सरकार ने उनके संगीत योगदान और अदम्य साहस के लिए पद्मश्री सम्मान दिया है. उन्होंने कभी पीड़ा को अपनी कमजोरी नहीं बनने दी, बल्कि उसे अपनी ताकत बनाया.
बुधरी टाटी की प्रेरक कहानी:
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के हिरानार गांव की बुधरी टाटी को लोग प्यार से बड़ी दीदी कहते हैं. नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ इलाके में 36-40 साल से लगातार सेवा कर रही हैं. यहां हिंसा, गरीबी और डर का माहौल है, लेकिन बुधरी दीदी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
वे महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई सिखाती हैं. अब तक 500 से ज्यादा महिलाएं उनके ट्रेनिंग सेंटर से गुजर चुकी हैं और खुद कमाकर परिवार चला रही हैं. बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करती हैं, स्कूल खुलवाती हैं. बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम में मदद करती हैं. छत्तीसगढ़ सरकार पहले भी उन्हें सम्मान दे चुकी है. नक्सल क्षेत्र में जहां बाहर का आदमी जाना डरता है, वहां बुधरी टाटी ने विश्वास और बदलाव का पुल बनाया है.