Padma Shri 2026: शिक्षा, स्वच्छता और हस्तकला में योगदान देने वाले तीन व्यक्तित्व होंगे सम्मानित
पद्म श्री 2026 के लिए चुने गए चरण हेम्ब्रम, इंदरजीत सिंह सिद्धू और खेमराज सुंद्रियाल ने शिक्षा, स्वच्छता और पारंपरिक हस्तकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु उन्हें 23 जून को सम्मानित करेंगी.
देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल पद्म पुरस्कार उन लोगों को दिए जाते हैं जिन्होंने समाज के लिए असाधारण कार्य किया हो. वर्ष 2026 के पद्म श्री सम्मान के लिए चयनित चरण हेम्ब्रम, स. इंदरजीत सिंह सिद्धू और खेमराज सुंद्रियाल ऐसे ही तीन नाम हैं, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है. शिक्षा, स्वच्छता और पारंपरिक बुनाई की विरासत को आगे बढ़ाने वाले इन व्यक्तित्वों को 23 जून, 2026 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित नागरिक अलंकरण समारोह में सम्मानित किया जाएगा.
चरण हेम्ब्रम: संथाली भाषा और संस्कृति के संवाहक
ओडिशा के चरण हेम्ब्रम ने संथाली भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. संथाली (ओल चिकी) शिक्षाविद और सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने दशकों तक समाज को दिशा दी. वर्ष 1992 से 2004 के बीच ओडिशा संथाली शिक्षा बोर्ड के सचिव के रूप में उनका कार्यकाल विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा. इस दौरान उन्होंने संथाली शिक्षा को संगठित और मजबूत बनाने के लिए कई पहल कीं. उनके प्रयासों से भाषा और संस्कृति को नई पहचान मिली तथा नई पीढ़ी तक इसकी पहुंच बढ़ी.
इंदरजीत सिंह सिद्धू: स्वच्छता को बनाया जीवन का मिशन
पंजाब पुलिस में उप महानिरीक्षक के पद से सेवानिवृत्त इंदरजीत सिंह सिद्धू को लोग ‘झाड़ू योद्धा’ के नाम से जानते हैं. उन्होंने स्वच्छता को केवल एक अभियान नहीं बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में अपनाया. करीब तीन दशकों से वह स्वेच्छा से पार्कों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों की सफाई करते रहे हैं. उन्होंने बेहतर सफाई व्यवस्था के लिए प्रशासन को लगातार सुझाव दिए और सफाई कर्मियों का मनोबल बढ़ाया. समाज की उदासीनता के बावजूद उन्होंने अपने प्रयास नहीं रोके और एक व्यक्ति की पहल को जनजागरूकता के संदेश में बदल दिया.
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खेमराज सुंद्रियाल: भारतीय बुनाई कला के वैश्विक दूत
खेमराज सुंद्रियाल का नाम भारत की हथकरघा और टेपेस्ट्री बुनाई परंपरा से जुड़ा एक प्रतिष्ठित नाम है. पांच दशक से अधिक समय से वह इस कला को संवारने और आगे बढ़ाने में जुटे हैं. उन्होंने न केवल बुनाई की जटिल तकनीकों में महारत हासिल की, बल्कि अनेक युवा कारीगरों को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी दिया. उनके नेतृत्व और मार्गदर्शन ने पारंपरिक भारतीय बुनाई को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. यही कारण है कि उन्हें इस क्षेत्र के अग्रणी हस्तशिल्प विशेषज्ञों में गिना जाता है.