देश की प्रशासनिक व्यवस्था का आधार स्तंभ मानी जाने वाली अखिल भारतीय सेवाओं में अधिकारियों की भारी कमी एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गई है. हाल ही में राज्यसभा में सीपीआई (एम) सांसद जॉन ब्रिटास के सवाल पर पेश आंकड़ों ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है. कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने खुलासा किया कि आईएएस, आईपीएस और आईएफएस में स्वीकृत संख्या के मुकाबले तैनाती काफी कम है. यह कमी न केवल शासन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है बल्कि विकास को बाधित कर रही है.
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में रिक्तियों का स्तर काफी चिंताजनक है. संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, आईएएस के लिए कुल स्वीकृत 6,858 पदों में से वर्तमान में केवल 5,457 अधिकारी ही सेवा में हैं. यानी 1,401 पद खाली पड़े हैं, जो कुल स्वीकृत संख्या का लगभग 20.4 प्रतिशत है. अधिकारियों की इस बड़ी कमी के कारण जिला प्रशासन और विभिन्न महत्वपूर्ण सरकारी विभागों में कार्य का बोझ बढ़ गया है, जिससे नीतिगत निर्णयों के कार्यान्वयन में देरी हो रही है और प्रशासनिक दक्षता घट रही है.
केवल आईएएस ही नहीं, बल्कि पुलिस (आईपीएस) और वन सेवा (आईएफएस) की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. आईपीएस के 4,984 स्वीकृत पदों में से 4,100 अधिकारी तैनात हैं, जिससे 884 रिक्तियां बनी हुई हैं. इसी तरह, भारतीय वन सेवा में 3,193 पदों में से 2,644 अधिकारी तैनात हैं और 549 पद खाली हैं. कानून-व्यवस्था बनाए रखने और पर्यावरण सुरक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इन अधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य है, लेकिन रिक्तियों के कारण सुरक्षा तंत्र पर भारी दबाव बना हुआ है.
कैडर के आधार पर विश्लेषण करने पर रिक्तियों का एक असमान वितरण सामने आता है. एजीएमयूटी कैडर, जिसमें दिल्ली, गोवा, मिजोरम और कई केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, 267 रिक्तियों के साथ सूची में सबसे ऊपर है. इसके बाद उत्तर प्रदेश का स्थान है, जहां अधिकारियों के 215 पद रिक्त पड़े हैं. यह स्थिति प्रशासनिक असंतुलन पैदा करती है, जिससे क्षेत्रीय विकास और सुशासन की राह में बाधाएं आती हैं. वर्तमान रिक्तियां क्षेत्रीय स्तर पर देश की प्रशासनिक क्षमता को काफी कमजोर कर रही हैं, जो अत्यंत चिंताजनक है.
UPSC द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित की जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा के बावजूद ये रिक्तियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. इसके मुख्य कारणों में अधिकारियों की सेवानिवृत्ति, पदोन्नति, समय से पहले सेवा छोड़ना और समय-समय पर स्वीकृत पदों की संख्या में होने वाली वृद्धि शामिल है. सरकार का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, लेकिन सेवानिवृत्ति और नई नियुक्तियों के बीच का बड़ा अंतराल फिलहाल कम नहीं हो पा रहा है. शासन की बढ़ती जिम्मेदारियां इस समस्या को और अधिक बढ़ा रही हैं.
केंद्र सरकार ने संसद में आश्वासन दिया है कि वह रिक्तियों की इस समस्या को दूर करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. सरकार समय-समय पर कैडर की शक्ति और भर्ती प्रक्रियाओं की गहन समीक्षा करती है ताकि अधिकारियों की कमी को न्यूनतम किया जा सके. बुनियादी ढांचे, लोक कल्याण और कानून-व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शासन को सुदृढ़ करने के लिए इन पदों को भरना प्राथमिकता दी जा रही है. आने वाले वर्षों में भर्ती की संख्या बढ़ाकर इस प्रशासनिक अंतराल को शीघ्र पाटने की एक प्रभावी योजना पर काम हो रहा है.