'इन 54 सीटों पर टिकी है सत्ता की बाजी, उत्तरी बंगाल में फिर गरमाई 'चाय की राजनीति'; जानें क्या रहा है इतिहास?

पश्चिम बंगाल विधानसबा चुनाव में अब महज कुछ दिनों का समय बचा है. हालांकि इस चुनाव को जीतने के लिए सभी पार्टियां उत्तरी इलाके पर जोर दे रही है. इस क्षेत्र में 54 विधानसभा सीटें हैं, जो बंगाल के भविष्य को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण रोल निभा सकता है.

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Shanu Sharma

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अब महज कुछ दिनों का समय  बचा है, इसी बीच उत्तरी बंगाल एक बार फिर सुर्खियों में है. चाय के बागानों की महक की तरह ही यहां की राजनीति का स्वाद भी अनिश्चित और निर्णायक बनता जा रहा है. 54 विधानसभा सीटों वाले इस क्षेत्र से किसी भी पार्टी के लिए सरकार बनाना या बचाना आसान हो सकता है.

राज्य में दो चरणों में मतदान होना है. पहला चरण 23 अप्रैल और दूसरा चरण में 29 अप्रैल को होना है, जिसके नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे. उत्तरी बंगाल के चाय बागान, डुआर्स और पहाड़ी क्षेत्र लंबे समय से राज्य की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे हैं. इस बार भी इन 54 सीटों का परिणाम पूरे राज्य की सत्ता समीकरण बदल सकता है.

वामपंथियों का गढ़ कहा जाता था उत्तरी बंगाल

वामपंथियों का मजबूत गढ़ माना जाने वाला उत्तरी बंगाल 2011 में बड़े बदलाव का गवाह बना था. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने मां, माटी, मानुष के नारे पर सवार होकर यहां 54 में से 28 सीटें जीत गई थी. वहीं 2016 में तृणमूल का दबदबा बरकरार रहा, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा ली. इस साल बीजेपी को शून्य से सात सीटें हासिल हुईं. लोकसभा चुनाव 2019 में BJP ने इस क्षेत्र की आठ लोकसभा सीटों में से सात पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद कदम को धीरे-धीरे मजबूत करते हुए 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने यहां 30 सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, हालांकि पूरे राज्य में बीजेपी अपनी मजबूती साबित नहीं कर पाई. लेकिन इस बार भगवा पार्टी के पास एक अच्छा मौका है. 

इलाके को क्यों कहा जाता है स्विंग जोन?

उत्तरी बंगाल अब तृणमूल और BJP के बीच सीधे मुकाबले का मैदान बन चुका है. BJP की बढ़त का मुख्य कारण चाय बागानों, आदिवासी इलाकों और राजबंशी समुदाय में उसकी मजबूत पैठ है. हालांकि हाल के दिनों में कुछ BJP नेताओं के तृणमूल में शामिल होने से समीकरण थोड़े उलझ गए हैं. वहीं दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस ने इस क्षेत्र पर अपना फोकस बढ़ा दिया है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अलीपुरद्वार और आसपास के तराई इलाकों से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की है. उत्तरी बंगाल को स्विंग जोन कहा जाता है क्योंकि यहां के मतदाता हर कुछ चुनावों में अपनी पसंद बदलते रहे हैं. इस क्षेत्र में स्थानीय मुद्दे जैसे रोजगार, मजदूरों के वेतन, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाएं अक्सर बड़े राष्ट्रीय मुद्दों पर भारी पड़ते हैं. BJP अपनी पुरानी रणनीति पर कायम है और पहाड़ी क्षेत्र की स्थानीय पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है. हालांकि नेताओं का पलड़ा बदलने से नतीजा कुछ भी हो सकता है.