MP Election 2023: गोहद विधानसभा में BJP ने खोले पत्ते, जानें किस वजह से खास है ये सीट
मध्य प्रदेश की गोहद से विधानसभा सीट बाहरी प्रत्याशियों के लिए मुफीद रही है. खास बात तो ये है कि गोहद सीट पर सिर्फ भिंड जिले की दूसरी विधानसभाओं के निवासी ही नहीं बल्कि प्रदेश के दूसरे जिलों उज्जैन और ग्वालियर से भी आए प्रत्याशी भी विधायक बने हैं.
नई दिल्ली: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में गोहद विधानसभा सीट (Gohad Assembly Seat) खासी अहम मानी जाती है. ये सीट आरक्षित है और यहां आजादी के बाद से अब तक 15 बार चुनाव हुए हैं. शुरुआत के 3 चुनावों को छोड़ दें तो यहां से बाहरी प्रत्याशी ही विधायक चुना जाता रहा है. 1957 में सुशीला सोबरन सिंह भदौरिया, 1962 में रामचरणलाल थापक और 1967 में कन्हैयालाल माहौर यहां से विधायक बने थे जो इसी विधानसभा क्षेत्र के निवासी हैं. इसके बाद 1972 के बाद से यहां लगातार बाहरी उम्मीदवार जीत का परचम लहराते रहे हैं.
तय हुआ प्रत्याशी का नाम
2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ये सीट इसलिए भी अहम हो जाती है क्योंकि बीजेपी ने चुनाव के लिए तारीखों की घोषणा से पहले ही प्रत्याशी का नाम फाइनल कर दिया है. माना जा रहा है कि ये वो सीट हैं, जहां बीजेपी की स्थिति कमजोर है और प्रत्याशियों को चुनाव से पहले तैयारियों के लिए ज्यादा समय मिलेगा. तो चलिए एक नजर डालते हैं गोहद सीट के चुनावी समीकरण पर.
गोहद की जनता के मन में क्या है?
गौरतलब है कि एक नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश का गठन होने के बाद से गोहद से विधानसभा सीट बाहरी प्रत्याशियों के लिए मुफीद रही है. खास बात तो ये है कि गोहद सीट पर सिर्फ भिंड जिले की दूसरी विधानसभाओं के निवासी ही नहीं बल्कि प्रदेश के दूसरे जिलों उज्जैन और ग्वालियर से भी आए प्रत्याशी विधायक बने. पिछले 46 सालों में गोहद की जनता ने कभी स्थानीय प्रत्याशी को विधानसभा में जाने का मौका ही नहीं दिया.
बीजेपी का रहा दबदबा
वर्ष 1957 से अब तक गोहद विधानसभा क्षेत्र से चुने गए विधायकों पर नजर डाली आए तो इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का अच्छा दबदबा रहा. पिछले 15 चुनावों में यहां से 8 बार बीजेपी का विधायक चुना गया. जबकि 5 बार कांग्रेस ने जीत दर्ज की है. एक-एक बार बीएसपी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से भी यहां विधायक रहे हैं. बीजेपी और कांग्रेस ने भी बाहरी प्रत्याशियों पर अधिक भरोसा दिखाया है.
गोहद विधानसभा का इतिहास
1957 सुशीला सोबरन सिंह भदौरिया (कांग्रेस)
1962 रामचरण लाल थापक (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी)
1967 कन्हैयालाल माहौर (जनसंघ)
1972 भूरेलाल फिरौजिया (जनसंघ)
1977 भूरेलाल फिरौजिया (जनता पार्टी)
1980 श्रीराम जाटव (बीजेपी) भिंड
1985 चर्तुभुज भदकारिया (कांग्रेस) ग्वालियर
1989 सोपत जाटव (कांग्रेस)
1990 श्रीराम जाटव (बीजेपी)
1993 चतुरीलाल बराहदिया (बसपा)
1998 लाल सिंह आर्य (बीजेपी)
2003 लाल सिंह आर्य (बीजेपी)
2008 माखनलाल जाटव (कांग्रेस)
2009 रणवीर जाटव (कांग्रेस)
2013 लाल सिंह आर्य (बीजेपी)
बन रहे हैं नए सियासी समीकरण
2018 के विधानसभा चुनाव में सिंधिया समर्थक रणवीर जाटव ने लाल सिंह आर्य को शिकस्त दी थी. बाद में रणवीर जाटव ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ बीजेपी में आ गए थे. इसके बाद उनकी सदस्यता चली गई थी. लाल सिंह आर्य को साइड कर बीजेपी ने गोहद से रणवीर जाटव उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया था. रणवीर जाटव कांग्रेस के मेवाराम जाटव से बुरी तरह हार गए थे. अब एक बार फिर लाल सिंह आर्य बीजेपी की तरफ से चुनावी समर में ताल ठोकेंगे.
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