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Shyam Benegal Death: श्याम बेनेगल ने बनाई ऐसी फिल्म, जिसने बांग्लादेश में करवा दिया था तख़्ता पलट, जानें ऐसा क्या हुआ?

श्याम बेनेगल का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ा नुकसान है. उनके योगदान और निर्देशन ने सिनेमा की दुनिया को एक नई दिशा दी. 'मुजीब: द मेकिंग ऑफ ए नेशन' के जरिए उन्होंने न केवल शेख मुजीब के जीवन को पर्दे पर जीवित किया, बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों को भी और मजबूती दी.

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Mayank Tiwari

श्याम बेनेगल का आज सोमवार, 23 दिसंबर को निधन हो गया। वे दो दिन पहले अपने घर पर गिर गए थे, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया। दो दिन से वे काेमा में थे और सोमवार शाम इलाज के दौरान उन्होंने आखिरी सांस ली. श्याम बेनेगल की आखिरी फिल्म 'मुजीब: द मेकिंग ऑफ ए नेशन' थी, जिसे उन्होंने निर्देशित किया था। इस फिल्म ने भारत और बांग्लादेश में बड़ी चर्चा पैदा की थी.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, यह फिल्म बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान पर आधारित थी, जो बांग्लादेश के राष्ट्रपति भी थे. उनकी जिंदगी पर बनी फिल्म ने बांग्लादेश में 2024 में तख्तापलट करवा दिया था और शेख हसीना को इस्तीफा देना पड़ा था. बता दें कि, फिल्म की शूटिंग बांग्लादेश में हुई है. इस फिल्म की घोषणा करते हुए बेनेगल ने बताया था कि शेख मुजीबुर रहमान के जीवन को पर्दे पर उतारना उनके लिए एक कठिन काम रहा है.

'मुजीब' फिल्म की अहमियत

'मुजीब: द मेकिंग ऑफ ए नेशन' बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की जीवनी पर आधारित थी. बेनेगल ने इसे एक चुनौतीपूर्ण काम माना और फिल्म की शूटिंग बांग्लादेश में की गई. शेख मुजीब के जीवन को पर्दे पर उतारना उनके लिए एक भावनात्मक यात्रा थी, जैसा कि उन्होंने खुद कहा था. फिल्म ने बांग्लादेश में राजनैतिक हलचल मचाई, और शेख हसीना को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. इस फिल्म को बंगाली के साथ-साथ हिन्दी भाषा में भी रिलीज किया गया था.अरिफिन शुवू ने इसमें मुजीब का रोल प्ले किया था.

फिल्म की कहानी और श्याम बेनेगल का दृष्टिकोण

इस बायोपिक में मुजीबुर्रहमान की बगावत, पाकिस्तान के खिलाफ उनकी जंग और उनके परिवार की दयनीय स्थिति को दिखाया गया है. फिल्म की कहानी उनके जेल जाने और फिर सैन्य तख्तापलट के दौरान अपने परिवार के साथ होने वाली हत्या की त्रासदी पर आधारित है. श्याम बेनेगल ने अपने दृष्टिकोण से फिल्म को जीवंत किया और बताया कि शेख मुजीब के जीवन और राजनीति से उन्हें गहरा आकर्षण था.

वहीं इस फिल्म की कहानी का अंत उस सैन्य तख्तापलट के साथ होता है, जब उनके और उनके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार दिया जाता है. उस दौरान किसी को भी बख्शा नहीं जाता है. उस वक्त शेख हसीना और उनकी बहन रेहाना इसलिए बच गई थीं, क्योंकि वो दोनों अपने परिवार से दूर जर्मनी में थीं.