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कश्मीर-लद्दाख में ये कैसे हालात, आ सकती है भूखों मरने की नौबत, स्थानीय लोगों से लेकर केंद्र सरकार तक परेशान

बदलते मौसम के कारण कश्मीर और लद्दाख के सामने एक बड़ी समस्या पैदा हो रही है. पर्यटन उद्योग के साथ-साथ लोगों के सामने अब मीठे पानी की परेशानी होने वाली है. नदियों का वाटर लेबल काफी कम हो रहा है.

Naresh Chaudhary

नई दिल्ली: कश्मीर और लद्दाख में एक बड़ी समस्या खड़ी हो रही है. समस्या भी ऐसी है कि लोगों के सामने भूखों मरने की स्थिति है, जिसके कारण स्थानीय लोगों से लेकर केंद्र सरकार तक परेशान है. कश्मीर में आतंक की समस्या पर लगाम लगाने के बाद सोचा था कि घाटी अब विकास पर पथ पर अग्रसर होगी. पर्यटकों की आमद बढ़ेगी तो रोजगार के मौके भी पैदा होंगे, लेकिन ताजा हालात ऐसे हैं कि पर्यटक यहां से मुंह मोड़ रहे हैं, क्योंकि इस साल हिमालयी क्षेत्र में 80 फीसदी से भी कम बर्फबारी हुई है. इसके कारण ये सर्दियां सूखी रही हैं. भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इसके लिए सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ की कमी को जिम्मेदार माना है. 

कश्मीर से लेकर लद्दाख तक गर्मी का मौसम

आईएमडी की ओर से पिछले दिनों कहा गया था कि सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के न होने से हिमालयी क्षेत्रों में मौसम बदल रहा है. पिछले हफ्ते की एर रिपोर्ट के अनुसार, लद्दाख के लेह में मौसम विज्ञान केंद्र के प्रमुख सोनम लोटस ने कहा था कि वर्षा की कमी से हिमालय क्षेत्र में मीठे पानी की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका है, जिससे बागवानी और कृषि उत्पादन प्रभावित होगी. उन्होंने कहा था कि जनवरी में सर्दी चरम पर होती है, लेकिन इस बार हैरानी की बात ये है कि लद्दाख और कश्मीर में गर्मी है. जो काफी चिंताजनक है.

कुछ हिल स्टेशनों पर ही पहुंचा 4 डिग्री तक तापमान

कश्मीर के शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के डीन (कृषि) रायहाना हबीब कंठ ने कहा था कि चिल्ला कलां अवधि (21 दिसंबर से 29 जनवरी) में बर्फबारी दक्षिण-पश्चिम मानसून शुरू होने से पहले क्षेत्र के लिए मीठे पानी का एकमात्र स्रोत होती है. 

उन्होंने बताया कि लंबे समय तक सूखे के दौर ने क्षेत्र की नदियों और नालों में जल स्तर को कम कर दिया है. आईएमडी के वैज्ञानिकों कृष्ण मिश्रा, नरेश कुमार और आरके जेनामणि की एक लिखित रिपोर्ट के अनुसार 29 दिसंबर से उत्तरी मैदानी इलाकों में अधिकतम तापमान सामान्य से 5-8 डिग्री सेल्सियस नीचे है, पश्चिमी हवा के कारण 7-8 जनवरी को राहत मिली है. 12 से 17 जनवरी तक क्षेत्र के कई हिल स्टेशनों पर न्यूनतम तापमान 4 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहा.

दो महीनों में आते हैं कम से कम 7 पश्चिमी विक्षोभ

इसके अलावा, 25 दिसंबर से उत्तर पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों में काफी घना कोहरा छाया हुआ है, जो 14 जनवरी को अपनी अधिकतम पर रहा था. पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के मैदानी इलाकों में विजिबिलिटी शून्य रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि दिसंबर और जनवरी के दौरान उत्तर पश्चिम भारत में 5-7 सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ आते हैं. इसके कारण हिमालयी इलाकों में अच्छी बर्फबारी होती है, लेकिन इस बार कोई मजबूत पश्चिमी विक्षोभ नहीं देखा गया है, जो एक समस्या बड़ी समस्या है.

इस बार 80 फीसदी से कम हुई है बर्फबारी

परिणामस्वरूप, पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में दिसंबर के महीने में बहुत कम वर्षा (बारिश/बर्फ) हुई है, जो सामान्य से करीब 80 प्रतिशत कम है. इसी तरह जनवरी में अब तक इस क्षेत्र में करीब शून्य वर्षा हुई है. वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह गंभीर मौसम मुख्य रूप से तीन कारणों से है. पहला उत्तर पश्चिम भारत में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ की कमी, दूसरा प्रचलित अल-नीनो की स्थिति और तीसरा एक मजबूत जेट स्ट्रीम है. इसके कारण घाटी में पर्यटन काफी प्रभावित हो रहा है. इस मौसम में ज्यादातर पर्यटक बर्फबारी देखने के लिए ही आते हैं. अब बर्फ नहीं होने पर पर्यटक यहां से मुंह मोड़ रहे हैं. 

टूरिज्म और एडवेंचर गेम्स इंडस्ट्री बुरी तरह से प्रभावित

हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि कश्मीर के गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम की परेशान कर देने वाली तस्वीरें सामने आई हैं. बताया गया था कि इन तस्वीरों में बर्फ गायब थी. जबकि पूर्व के वर्षों में यहां अच्छी खासी बर्फबारी होती थी. इस बार बर्फबारी नहीं होने से हॉस्पिटेलिटी इंडस्ट्री और एडवेंचर गेम्स खेलों से जुड़े कारोबारी लोग सबसे बुरी तरह से प्रभावित हैं. बर्फबारी नहीं होने से होटलों की बुकिंग रद्द हो रही हैं. द इकोनॉमिक टाइम्स ने ट्रैवल एजेंट्स एसोसिएशन ऑफ कश्मीर के अध्यक्ष रूफ ट्रैंबू के हवाले से कहा कि इस साल गुलमर्ग में पर्यटकों की संख्या में 70% की गिरावट देखी गई है.