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Karnataka Temple Management Bill: क्या सच में 20 साल से लागू है मंदिरों पर टैक्स वाला बिल, अचानक क्यों हो रहा विवाद?

Karnataka Temple Management Bill: कर्नाटक में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को लेकर भाजपा इस समय हमलावर हो रहा है, क्योंकि राज्य में मंदिरों की आय पर 10 प्रतिशत का टैक्स लगाया गया है. ऐसे मेंजानिए कि आखिर पूरा विवाद क्या है और मंदिरों पर टैक्स की परंपरा यहां कितनी पुरानी है?

India Daily Live

Karnataka Temple Management Bill: कर्नाटक में इस समय मंदिरों पर टैक्स लगाए जाने का मामला तूल पकड़ रहा है. हालांकि राज्य विधान परिषद में ये बिल गिर गया है, क्योंकि यहां भाजपा और दूसरी  पार्टियों बहुमत में हैं. राज्य की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस का कहना है कि ये बिल राज्य में 20 साल पहले से ही लागू है. ऐसे में आपको ये जानना बेहद जरूरी है कि जब ये बिल पहले से लागू का है तो इतना बवाल क्यों है? तो समझते हैं इसकी पूरी कहानी.

कर्नाटक राज्य विधानसभा में 'कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती विधेयक 2024' पारित किया है, जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस को 'हिंदू विरोधी' कहा है. विधेयक में कहा गया है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली राज्य सरकार अब 1 करोड़ रुपये से ज्यादा राजस्व वाले मंदिरों से 10% राजस्व वसूलेगी और 10 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये के बीच राजस्व वाले मंदिरों से 5% राजस्व लिया जाएगा. 

भाजपा ने कांग्रेस पर साधा निशाना, कहा- हिंदू विरोधी

इसके बादसे भाजपा और कांग्रेस में जुबानी जंग तेज हो गई है. भाजपा ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए 'हिंदू विरोधी' नीतियां लागू करने का आरोप लगाया है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विजयेंद्र येदियुरप्पा ने आरोप लगाया कि सरकार ने अपने खाली खजाने को भरने के लिए ये विधेयक पारित किया है. भाजपा ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा है कि कांग्रेस सरकार, जो राज्य में लगातार हिंदू विरोधी नीतियां अपना रही है, ने अब मंदिरों के राजस्व पर टेढ़ी नजर डाली है. अपने खाली खजाने को भरने के लिए हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती विधेयक पारित किया है. 

पहले कर्नाटक में मंदिरों के लिए ये थी व्यवस्था

उन्होंने कहा है कि इसके तहत सरकार 1 करोड़ रुपये से ज्यादा की आय वाले मंदिरों से 10% राजस्व लेगी, जो गरीबी के अलावा कुछ नहीं है. भगवान के ज्ञान और मंदिर के विकास के लिए भक्तों द्वारा समर्पित चढ़ावे को मंदिर के जीर्णोद्धार और भक्तों की सुविधा के लिए रखा जाना चाहिए. यदि इसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए रखा जाता है तो ये लोगों की दैवीय मान्यताओं के साथ धोखाधड़ी होगी. 

सीएम सिद्धारमैया ने एक एक्स पर की ये पोस्ट

अब इस पूरे विवाद के बीच कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने अपने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि हिंदू धार्मिक संस्थानों और धर्मार्थ बंदोबस्ती विधेयक में कर्नाटक सरकार के संशोधनों को राजनीतिक लाभ लेने के लिए गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. साल 1997 में अधिनियम के लागू होने के बाद से इसकों लेकर एक सामान्य आदेश दिया गया है.

हालिया संशोधन से पहले मंदिरों की सालभर की शुद्ध आय का 10 प्रतिशत  सरकार का होता था. ये व्यवस्था उन मंदिरों पर लागू थी, जहां वार्षिक आय 10 लाख रुपये से ज्यादा होती थी. जिन मंदिर की वार्षिक आय 10 लाख रुपये से कम होती थी, वहां 5 प्रतिशत राजस्व लिया जाता था. 

बिल में संशोधन के बाद ये हुआ है बदलाव

संशोधन के बाद अब साल में एक करोड़ रुपये से ज्यादा आय वाले मंदिरों से 10 प्रतिशत राजस्व लिया जाए. वहीं 10 लाख रुपये से ज्यादा और एक करोड़ रुपये से कम आय वाले मंदिरों से 5 प्रतिशत का राजस्व वसूला जाएगा. सिद्धारमैया की ओर से कहा गया है कि सामान्य पूल का प्रबंधन सिर्फ मंदिरों से जुड़े धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता है. उन्होंने कहा कि साल 2003 में अधिनियम लागू होने के बाद से कॉमन पूल फंड का इस्तेमाल करके केवल हिंदू संस्थानों के धार्मिक उद्देश्यों के लिए किया गया है और भविष्य में भी इसका उपयोग उन्हीं उद्देश्यों के लिए किया जाता रहेगा.